बुधवार, 3 अप्रैल 2019

सही क़दम




बारिश रुक गयी थी । पर बादल थे । और ठंडी बयार बह रही थी । चाची ने बेसन की गरम-गरम पकौड़ियाँ बनायीं थीं । सारे के सारे चचेरे भाई-बहन गुट बना कर  बाहर बरामदे में बैठे हुए थे । अनुभा जो इन सब में  बड़ी थी, अभी-अभी अदरक वाली चाय बना कर ले आई थी । चाय ही नहीं, बातों और गप्पों की भी चुस्कियां सब ले रहे थे ।

इतने में प्रभात को सूझा कि क्यों न इतने अच्छे मौसम में गोल चक्कर घूमने जाया जाये ! एकमत से सभी झट तैयार हो गए । चांडाल चौकड़ी निकल पड़ी घूमने । स्कूल में पढ़ने वाले नील, सायली और पायल । कॉलेज में पढ़ने वाले अनिकेत, निखिल और अनुभा ।

गोल चक्कर से घूम कर लौटने लगे तो रास्ते में एक मूंगफली बेचने वाला बच्चा मिला । सबने एक-एक पुड़िया ली । चलते-चलते अनुभा और सायली थोड़ा आगे निकल गए । बाकी चारों एक-दूसरे की खिंचाई करते हुए ज़रा पीछे रह गए थे और अपने में मशगूल थे ।

अनुभा और सायली अपनी बातों में इतनी मगन थीं कि सामने से आते दो लड़कों पर उनका ध्यान नहीं गया । उनमें से एक लड़का अचानक सायली से टकरा गया और उसका दुपट्टा खींचने लगा । अनुभा ने जैसे ही ये हरकत देखी , वह लड़के पर झपट पड़ी और उसका कालर पकड़ कर उस पर चिल्लाने लगी , "क्या ? क्या कर रहा है ? हाँ  ! क्या कर रहा है ?  

बाकी चारों का अब ध्यान गया इस ओर ।  चारों भाग कर आये और अनुभा को उस लड़के से अलग करने की कोशिश करने लगे ।
अनिकेत और निखिल बोले, "अनुभा ! अनुभा ! तू हट ! हम देखते हैं !"
नील बोला, "क्या हुआ दीदी ?" … "क्या हुआ सायली ?"

अनुभा ने किसी की नहीं सुनी । उस लड़के के कालर पर अनुभा की पकड़ और कस गयी । उसका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था । उसने अपने भाइयों को परे धकेल दिया और उस लड़के को धक्का देकर पास ही पड़ी बेंच पर ले गयी । सड़क के किनारे थी ये पत्थर की बेंच ।

अनुभा की प्रतिक्रिया उस लड़के के लिए पूर्णतः अनपेक्षित थी । वह भौंचक्का रह गया था । उसकी सारी मस्ती काफ़ूर हो गयी थी । वही हाल उसके साथ वाले लड़कों का भी था । अनुभा ने धक्का दे कर उस लड़के को बेंच पर बैठा दिया और उस पर अपनी पकड़ ढीली ना करते हुए, बेंच पर उसके पास बैठ गयी ।

अनुभा के चेहरा अभी भी  तमतमा रहा था पर उसने एकदम शांत और गंभीर आवाज़ में उस लड़के से कहा - "क्या नाम है तुम्हारा ?"
लड़के की आवाज़ मुश्किल से फूटी, "सिद्धार्थ । "
अनुभा, "नाम तो बड़ा अच्छा है । काम ऐसे टुच्चेपने के क्यों करता है ?"
सिद्धार्थ कुछ ना बोल पाया ।
अनुभा ने कड़क कर कहा, "मोबाइल दे अपना !"
सिद्धार्थ अब गिड़गिड़ाने लगा - "गलती हो गयी दीदी ! माफ़ कर दो ! सॉरी !"
अनुभा फिर कड़की, "फ़ोन दे अपना चुपचाप !"
सिद्धार्थ सकपका कर जेब से फ़ोन निकालने लगा । फ़ोन निकाल कर उसने अनुभा को दे दिया और फिर गिड़गिड़ाने लगा - "दीदी ! सॉरी ! सॉरी बोला ना दीदी ! पुलिस को फ़ोन मत करना प्लीज़ ! प्लीज़ !"
अनुभा - "अगर पुलिस को फ़ोन करना होता तो मैं अपने फ़ोन से भी कर सकती थी । हाथ हटा  .... ! पर . . तेरे फ़ोन में तेरे घर का नंबर होगा ना ! 
घर  … home  … ये रहा ।"    
सिद्धार्थ ने घबरा कर अनुभा का हाथ पकड़ लिया- "दीदी नहीं ! घर पर फ़ोन नहीं करना ! घर पर नहीं प्लीज़ !" सिद्धार्थ हाथ जोड़ कर कहने लगा - "मुझे मार लो आप लोग ! पर घर फ़ोन नहीं करना प्लीज़ !"
अनुभा - "क्यों ? घर पर फ़ोन क्यों नहीं ? ऐसा क्या किया है तुमने ? किस बात का डर ?"            
सिद्धार्थ - "नहीं ! नहीं ! प्लीज़ दीदी !"       
अनुभा - "तेरे घर पर माँ होगी ! बहन होगी ! क्यों ? उनको बताते हैं ना  . . तू क्या कर रहा था !"
सिद्धार्थ - "नहीं ! नहीं !"
अनुभा - "ठीक है । अगली बार किसी लड़की को परेशान करने का मन करे तो पहले अपनी माँ और बहन को याद कर लेना ! समझा ! "
ऐसा कहने के साथ अनुभा ने एक ज़ोर का तमाचा रसीद किया सिद्धार्थ के गाल पर और उठ खड़ी हुई, सिद्धार्थ का कालर छोड़ कर । सिद्धार्थ ने डरते हुए अनुभा के भाइयों की तरफ देखा । फिर सायली की तरफ देख कर नज़रें झुका लीं और बोला , "सॉरी । "

अनुभा ने सायली का हाथ पकड़ा और घर की तरफ़ चलने लगी । कुछ दूर तक सब चुपचाप चलते रहे । फिर अनिकेत बोला , "बहुत हिम्मत की तूने अनुभा । पर अगर उन लड़कों के पास चाकू, छुरा होता तो ?"

अनुभा ने कहा , "हो सकता था , वो हमें चोट पहुँचाते , पर खतरा मोल लेना ज़रूरी था । आखिर इसी रास्ते से कल हम सबको स्कूल या कॉलेज जाना ही पड़ता । कैसे जाते ? ऐसे ही डर - डर कर ?" ये कह कर अनुभा ने अनिकेत की ओर देखा और चुप हो गयी । 

कुछ देर में अनुभा फिर बोली , "और अपना रास्ता सुरक्षित करने के साथ-साथ कभी-कभी हमें भूले-भटकों को भी रास्ता दिखाना पड़ता है । ज़रूरी है ।"

अनुभा के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी और सभी भाई-बहन भी एक दूसरे की तरफ़ देख कर मुस्कुराने लगे । ये सहीकदम उठाने की आत्मविश्वास भरी मुस्कान थी ।

मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

The Sepoy Revolution




Workers cleaning the gutters
Without the safety gears
Died of poisonous gases.
Cried the bold headlines.

We the moral custodians
We the conscientious
We the sympathetic righteous
Shed thought-provoking tears.
Blamed the insensitive parties
And debated the dubious ethics.

While we hurled accusations
And became moral champions.
Three young students set to work
To figure out practical solutions.
They have finally devised an option.
To replace human scavengers
With affordable robotic scavengers.

We just found fault with the system.
They simply solved the problem.

Now it's our turn again to seek justice.
Insist on getting the idea implemented.

If opportunities come disguised as problems..
Then here is a mighty challenge for us to overcome.



Story Courtesy : Social Story
Image Courtesy : The Hindu


बुधवार, 27 मार्च 2019

बूंद


तुम सरल 
जल की बूंद,
ओस की बिंदी,
अश्रु का मोती,
निश्छल पारदर्शी ।

क्षणभंगुर ..
पर अमिट
पावन स्मृति
क्षीर सम ।

सूर्य रश्मि का
परस पाकर
बन जाती
पारसमणि ।

तुम कहीं
जाती नहीं ।
विलय होती ।
बन जाती
अंतर्चेतना।

सहसा
समा जाती,
सहृदय
पुष्प की
पंखुरियों में ।

तुम निरी
इक बूंद !

बूंद में ही
खिलता
सजल सतरंगी
इंद्रधनुष ।