रविवार, 17 मार्च 2019

सही की बही




सही में यार !
बहुत मुश्किल है !
सही क्या ?
ग़लत क्या ?
इस सब की विवेचना ।
कोई कितना करे ?
और कब तक करे ?
किंतु परंतु का कोई
अंतिम छोर है क्या ?
निष्कर्ष कैसे निकलेगा ?

रेगिस्तान में जल दिखना
तो छलना है ।
मृगतृष्णा है ।

क्षितिज जब तक
दूर है,
सबको मंज़ूर है ।
नज़र का नूर है ।
मगर पास गए अगर
तो कुछ भी नहीं है ।
भुलावा है ।
मनमोहक है पर
मात्र दृष्टिकोण है ।

अब बताइए ।
क्या किया जाए ?
सही को कहाँ ढूंढा जाए ?

सही तो भई
परिस्थितियों की बही पर
समय के दस्तख़त हैं ।
समय के साथ
लिखा-पढ़ी करने पर
बदल भी सकते हैं ।

फिर एक दिन ऐसे ही
बैठे-बैठे अनायास ही
सब समझ में आ गया ।

असल में काम सही है वही
जिसका मंसूबा नेक हो ।

मंगलवार, 12 मार्च 2019

पार उतराई




कोई दुख
होता है ऐसा
जो कभी भी
कहते नहीं बनता। 

कविता में नहीं,
कथा में नहीं,
बंदिश में नहीं,
रंगों में नहीं,
बस चुपचाप
बहता रहता है
भीतर कहीं,
चौड़े पाट की
नदी की तरह ।

तट कभी भी
मिलते नहीं ।
पर उम्मीद भी
कभी टूटी नहीं ।
अब भी 
लहरों में ढूंढती
नाव केवट की,
जो पार उतारती
प्रभु राम को भी,
लिए बिना ही
पार उतराई ।


शुक्रवार, 8 मार्च 2019

अब हमारी बारी



अभिमन्यु की वीरगति 
कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। 
बलिदान की परिणति 
न्याय की स्थापना ही होती। 

यही इस देश की नीति .. 

समस्त विश्व से प्रीति 
पर युद्ध में चाणक्य नीति। 
विजय सदैव मानवता की 
क्यूंकि लक्ष्य केवल शांति ही। 

जवानों ने खूब निभाई ज़िम्मेदारी 

अब आई हर भारत वासी की बारी। 

इसलिए आज का प्रण हो यही 

हम भूलें ना वीरों का बलिदान कभी। 
स्वाभिमान को भारत के ठेस ना लगे कभी 
ध्वज हमारा शान से लहराए यूँ ही।