कोई दुख
होता है ऐसा
जो कभी भी
कहते नहीं बनता।
होता है ऐसा
जो कभी भी
कहते नहीं बनता।
कविता में नहीं,
कथा में नहीं,
बंदिश में नहीं,
रंगों में नहीं,
कथा में नहीं,
बंदिश में नहीं,
रंगों में नहीं,
बस चुपचाप
बहता रहता है
भीतर कहीं,
चौड़े पाट की
नदी की तरह ।
बहता रहता है
भीतर कहीं,
चौड़े पाट की
नदी की तरह ।
तट कभी भी
मिलते नहीं ।
पर उम्मीद भी
कभी टूटी नहीं ।
मिलते नहीं ।
पर उम्मीद भी
कभी टूटी नहीं ।
अब भी
लहरों में ढूंढती
नाव केवट की,
जो पार उतारती
प्रभु राम को भी,
लिए बिना ही
पार उतराई ।
नाव केवट की,
जो पार उतारती
प्रभु राम को भी,
लिए बिना ही
पार उतराई ।



