Thursday, 7 March 2019

मुझे क्या करना है ?




सीमा पर फ़ौजी तो
हमेशा ही तैनात रहा।
क्या हमें भी अपने
कर्तव्य का भान रहा ?

युद्ध
हर जगह चल रहा है। 
युद्ध
हर कोई लड़ रहा है। 

कोई सीमा का प्रहरी है। 
कोई घर में युद्ध बंदी है। 

युद्ध की कोई
सीमा है क्या ?
युद्ध की कोई
गरिमा है क्या ?

भीतर हम सबके 
एक लक्ष्मण रेखा है। 
अपने सिवा इसे
किसी ने नहीं देखा है। 
लेकिन हम सबको पता है.
रावण क्यों बुरा है। 

सीमा पर जब जवान
जान हथेली पर लिए
लड़ रहा है  .. 
जवान का परिवार
अपनी भावनाओं से
जूझ रहा है  .. 
देश के 
हर नागरिक की भूमिका,
कृतज्ञ हो कर, 
धैर्य धर यह सोचना  .. 
मुझे क्या करना है ?

मुझे क्या करना है ?
कैसे सेना के त्याग का
अभिनन्दन करना है ?

हमको अपने-अपने बल पर,
अपने-अपने मोर्चे पर 
रोज़ एक युद्ध लड़ना है। 
रोज़ एक युद्ध जीतना है। 
अंदरूनी ताक़त से 
ज़िम्मेदार भारत 
बने रहना है।  
दृढ़ संकल्प और मेहनत से,
खुशहाल भारत गढ़ना है. 

13 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-03-2019) को "जूता चलता देखकर, जनसेवक लाचार" (चर्चा अंक-3268) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. शुक्रिया शास्त्रीजी ।
      बात को आगे बढ़ने के लिए ।

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  2. बहुत बहुत सुंदर भावना हर एक के मन्न और अपनाने योग्य
    सार्थक प्रस्तुति ।

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    1. धन्यवाद.मन की वीणा यह कहती है ..
      उत्तरदायित्व हम सबका साझा है.

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  3. बहुत सुंदर रचना 👌

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    1. धन्यवाद. हम सबको मिल कर अपने भारत की सुन्दरता को सहेजना है.

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  4. बहुत सुन्दर ,सार्थक.
    लाजवाब भावाभिव्यक्ति...
    वाह!!!

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    1. आभार सुधाजी.
      विडंबना यह है कि हमें ख़ुद को याद दिलाना पड़ रहा है - हमारा फ़र्ज़ क्या है ?
      भारत में जो होता है, उसमें हम सब की हिस्सेदारी है.

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  5. धन्यवाद विश्वमोहन जी.
    इतनी बहस और तू तू मैं मैं करने वालों को ये भूलते देखा कि देशभक्ति अपेक्षा नहीं, उत्तरदायित्व और सेवा से होती है.शोर से भ्रमित आक्रोश को याद दिलाना भी ज़रूरी हो गया
    है.

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  6. बहुत ही शानदार और सराहनीय

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    1. अनेकानेक धन्यवाद संजय भास्कर जी.

      देश अपना.
      मसले अपने,
      दूसरे क्यों सुलझायें ?

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