जब तक होश है।
रग-रग में जोश है।
जिगर में
जोश के बुलबुले नहीं ,
जोश के जुगनू भी नहीं
जो पलक झपकने तक ही
मौजूद रहें।
ये जो
कौंधता है
मेरे वजूद में ,
बिजली की तरह . .
ये बरसों की तपस्या है।
ठोकर खा-खा कर जो संभला है,
आग में तप कर जो निखरा है,
वो फ़ौलादी हौसला है।
ये वीरता का अखंड दिया है।
जो अलख जगाने वाला है।
तिरंगे की सौगंध है।
माँ से बच्चों का वादा है।
दुष्टता का शत्रु है।
मानवता का मित्र है।
जब तक होश है।
रग रग में जोश है।



