मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

चलो फिर से




चलो 
फिर से शुरु
करते हैं जीना ।

इस बार
शायद आ जाए
ठीक से जीना ।

शत-प्रतिशत
मुनाफ़े का सौदा
नहीं है जीना ।

बहुत जानो
अगर सीख पाओ
थोड़े में बसर करना ।

बहुत समझो
अगर आ जाए
हार कर जीतना ।

बूंद-बूंद
जीवन की सरसता
का आनंद लेना ।

पल-पल
भाग्य रेखाओं में
मेहंदी की तरह रचना ।

चलो
फिर से शुरु
करते हैं जीना ।

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

फुर्र




जाने कहाँ से
एक रंग-बिरंगी 
चिड़िया छोटी-सी
खिड़की पर आ बैठी ।
जान ना पहचान
बिन बुलाई मेहमान !
पर जान पड़ी
अपनी-सी ।
स्वागत को 
हाथ बढ़ाया ही था ..
कि उड़ गई
फुर्र !


जता गई ..
आनंद की अनुभूति
होती है क्षणिक ।
हृदय के तार
झंकृत कर जाती है,
तरंग जो एक मधुर
रागिनी बन जाती है ।
जिसे वही चिड़िया
किसी दिन
किसी और को सुनाती है ।
अनायास ही,
खिड़की पर बैठी
चहचहाती हुई ।
और फिर वही ..
एक दो तीन
और फुर्र !



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मापदंड



उचट जाता है मन अक्सर 
जीवन की दुविधा ढ़ोते-ढ़ोते ।

बार-बार सोचते-सोचते
फ़ैसले जो लिए थे
बहुत सोच-समझ के
क्या वास्तव में सही थे ?

क्योंकि कई बार
सही का मापदंड
होती है सफलता ।

फिर विवेक है कहता,
यही तो है सुंदरता ।

हर बार संभव नहीं जीतना ।
पर आ गया ना अच्छा खेलना ?