शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

घंटी बजाती आई चिट्ठी


सायकिल की घंटी 

बजती थी जब

सुबह-सुबह, दूध वाले, 

अखबार वाले के आने की

इत्तिला देती थी ।

दोपहर के आसपास

सायकिल की घंटी बजाते

आते थे डाक बाबू..

खाकी यूनिफ़ाॅर्म पहने

खाकी टोपी लगाए,

खाकी बस्ते में लिए 

चिट्ठियों के पुलिंदे ।

अंतर्देशीय, पोस्टकार्ड, लिफ़ाफ़े,

मनी ऑर्डर और तार..

संदेसों की राह तकती

आस भरी निगाहें ।

दूर बसे अपनों से मन ही मन

निरंतर बातें करते-करते

कितने पत्र लिख दिए गए होंगे..

कितने भाव मोती बन कर

ढुलके होंगे,

काग़ज़ ने सोख लिए होंगे ..

कितने शब्द उतरे होंगे

काग़ज़ पर अपनी बात कहने..

कौन जाने ? 

पर पुरानी दराज़ों में अब भी

मिल जाते हैं हाथ से लिखे ख़त 

जिन्हें छू कर और पढ़ कर 

याद आ जाती है डाक बाबू की

खाकी वर्दी और दूर से आती

सायकिल की जलतरंगी घंटी ।



चित्र : अंतरजाल से साभार  




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