नीलकंठ महादेव बाघंबर धारी
हरो मन के विकार हे त्रिशूलधारी ।
तुमने विषपान कर हे त्रिपुरारी
जन की पीङा धारण की स्वयं ।
जीव मात्र को दिया पूर्ण संरक्षण
और सम्मान दिया हे पशुपतिनाथ ।
नंदी को माना कुटुंब का सदस्य
अहर्निश सेवा में किया संलग्न ।
शीष की जटाओं में गंगा की धारण
धारा का वेग बाँध,धरा का कल्याण।
वासुकि कंठ हार बन सदा ही रहें संग
जोगी की जटाओं में विराजें अर्ध चंद्र ।
रूपा सी ज्योत्सना से जगत समस्त
प्रेरित हो रचता कला, भाव अनुरूप ।
भोलेनाथ मन में हमारे हो शुभ संकल्प
ध्यान में रहे सदा सत्यम् शिवम् सुंदरम् ।
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026
सत्यम शिवम सुंदरम
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
कुछ अपने मन की भी कहिए