नवागन्तुक समय प्रतीक्षारत देहली पार
देहली के भीतर रच-बस गया है अतीत
बीते कल की नब्ज़ थाम करना स्वागत
चुनौतियाँ मिलेंगी करते ही चौखट पार
खुलते ही द्वार होता संभावना का जन्म
हवा-पानी,गंध,धूप और धूल का पदार्पण
ठोक-पीट सिखाता जीवन का शिष्टाचार
अनुभव और अनुभूति के सहज नेगाचार
मन की वीथियों के छूटें जब द्वंद और फंद
तब खुलते हैं स्वत: सानंद मंदिर के कपाट
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कोलम कलाकार : श्री करन पति

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