Wednesday, 4 July 2018

फूलों की माला

फूलों की माला गूँथना
मन के भाव पिरोने जैसा है ।
बिना बिंधे बिना बंधे
फूल वेणी में
ठहर नहीं सकते ।
यदि बिखर गए
तो माला बने कैसे ?
अनुभव की चुभन बिना
फूलों में पराग कैसा ?
रंग और सुगंध बिना
फूल अर्पित हों कैसे ?
फूलों की सरल सरसता
भक्ति की पुनीत भावना ।
दोनों जब खिलते हैं,
माला में पिरोये जाते हैं ।


11 comments:

anmol mathur said...

Pyari panktiyan padh ke pushtimarg mei thakur ji ki pushp mala ka bhaav yaad aya. Pushp matlab vraj bhakt ka hriday, sui matlab shri guru, dhaaga yani bhakti sootr aur thakur ji ka ye mala dharan karna yaani, shri guru ne aapko thakurji ko samarpit kiya.

Unknown said...

Bahut sundar

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (06-07-2018) को "सोशल मीडिया में हमारी भूमिका" (चर्चा अंक-3023) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

noopuram said...


आपने बहुत सुन्दर व्याख्या की .
भाव से भाव जुड़ गया .
धन्यवाद अनमोल सा .

शास्त्रीजी हार्दिक आभार सदा प्रोत्साहन देने के लिए .

Thank you Unknown. Glad you read and liked.

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर = RAJA Kumarendra Singh Sengar said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन वयस्क होता बचपन और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Unknown said...

साधना करने वाला भावक उस चित्रा में अच्छी तरह गूंथे गए पद्म की
भावना करता है , क्योंकि भाव से योग की प्राप्ति होती है ,भाव से ही
शिव भावित होते हैं !

यतः भाव से ही शक्ति की प्राप्ति होती है ,इसलिए
भाव का आश्रय लेना चाहिए !
जब जो साधक अपने मनोयोग की
शुद्धि के लिए सदा दिन रात अपना मन उस परब्रह्म में लीन करता है
तब वही मोक्ष है ,वही गुण सिन्धुरूपी एवं कालाग्नि रूपी निज देव का
देवता है !

Dhruv Singh said...

निमंत्रण विशेष : हम चाहते हैं आदरणीय रोली अभिलाषा जी को उनके प्रथम पुस्तक ''बदलते रिश्तों का समीकरण'' के प्रकाशन हेतु आपसभी लोकतंत्र संवाद मंच पर 'सोमवार' ०९ जुलाई २०१८ को अपने आगमन के साथ उन्हें प्रोत्साहन व स्नेह प्रदान करें। सादर 'एकलव्य' https://loktantrasanvad.blogspot.in/

Anonymous said...

Write more, thats all I have to say. Literally, it seems as though you relied on the video to make your point.

You obviously know what youre talking about, why waste
your intelligence on just posting videos to your blog when you could be giving us something informative to read?

Anonymous said...

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noopuram said...

सेंगरजी, ब्लॉग बुलेटिन और वयस्क होता बचपन पर स्थान देने के लिए हार्दिक आभार.
अनाम पाठक, भक्त के भाव की सारगर्भित व्याख्या कर आपने अनुग्रहित किया.

Dear Anonymous, I appreciate your frank opinion and I am grateful you did not just let it go. Thank you for making it a point to mention. I will keep it in mind. However, my humble submission is that as long as the thought is conveyed, the form and the format chosen does not really matter. If a picture, a song or quote connects with the same thought or sometimes inspires it, there is no set of rules to be essentially followed. Though I agree that it should be a spontaneous collage not forced. Thank you again for your guidance.

Another anonymous reader, I am happy to know that in some way what I wrote has been of some help to you and your colleagues. It would be interesting to know how....and your stories. But that is your wish. Thank you.

Third Anonymous Reader, it is a pleasant surprise to know that you liked the blog in its simplicity. However, it is a very basic format. I am still in the learning mode. But glad it works for you. Thank you.

नमस्ते