Sunday, 24 September 2017

मित्रता




गले लगाया उसने मुझे 
और कहा,
जैसी भी तुम हो 
मुझे भाती हो । 

तुमने मुझे 
कुछ कम पाया
और जताया,
रंग तुम्हारे फीके हैं,
और कई जगह दरार है,
कुछ करो ।

उसकी दरियादिली,
तुम्हारी नुक्ताचीनी,
दोनों मुझे स्वीकार हैं ।
मन में आभार है ।

उसने मुझे अपनाया ।
तुमने सजग बनाया ।
दोनों से रिश्ता बरकरार है ।
तकरार में मनुहार है ।
मेरे बारे में तुमने 
सोचा तो सही !
ये भी कम नहीं ।

दोनों तटों के बीच 
स्नेह की नदी 
कल कल बहती है ।
दो मुंडेरों के बीच  
जैसे मित्रता के खेत 
लहलहाते हों ।
सहृदयता के सरोवर में 
मानो कृतज्ञता के 
कमल खिले हों ।

विचार और व्यवहार के 
दो सूत्र जहाँ जुड़ते हों,
संवेदना के उस क्षितिज पर 
अपनत्व का सूर्य 
अस्त और उदय होता है ।


9 comments:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 25 सितम्बर 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

अमित जैन 'मौलिक' said...

गले लगाया उसने मुझे
और कहा,
जैसी भी तुम हो
मुझे भाती हो ।


वाह वाह। अप्रतिम, यूँ के जैसे-

गुनगुनाती हुईं आईं हों फलक से कुछ बूंदे।
लगता है कोई बदली किसी पायजेब से टकराई हो।

Sudha Devrani said...

वाह !!!
बहुत सुन्दर...

Meena Sharma said...


विचार और व्यवहार के
दो सूत्र जहाँ जुड़ते हों,
संवेदना के उस क्षितिज पर
अपनत्व का सूर्य
अस्त और उदय होता है ।
....ये पंक्तियाँ सुविचार के रूप में सँजोकर रखूँगी ।
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है आपकी । बधाई ।

noopuram said...

चित्र साभार : सुवीर शांडिल्य
धन्यवाद सुवीर ।

noopuram said...

आदरणीया यशोदा जी,
बहुत बहुत आभार आपका ।
सौभाग्य हमारा ।

विलंब के लिए क्षमा कीजिएगा ।
आप सबका मार्गदर्शन मिलता रहे ।
नमस्ते ।

noopuram said...

आभार सहित धन्यवाद सुधाजी ।
आपको पढ़ कर अच्छा लगा,
ये जान कर अच्छा लगा ।

noopuram said...

अभिव्यक्ति अनुभव एवं अनुभूति जन्य है ।
ये अनुभव जीवन की देन है ।
आपको अच्छा लगना ही सबसे बड़ा पुरस्कार है । कृपया साथ रहिएगा । अच्छा लगेगा ।

noopuram said...

बूंदों के नूपुरों की रुनझुन आपने ही सुनी ।
बदली बरस गई । मिट्टी की खुशबू आई । बरखा मन को भाई ।

सादर नमस्कार ।
और बहुत बहुत आभार ।

नमस्ते