Wednesday, 23 November 2016

मैं कैसे छोड़ दूँ कोशिश करना ?





सूरज की आड़ में
बार बार अँधेरा
उड़ाता है
मिट्टी के मामूली दीये का
मज़ाक ।
बार बार
याद दिलाता है उसे
उसकी औक़ात ।
तो क्या
मिट्टी का मामूली दीया
छोड़ देता है जलना ?
तो मैं कैसे छोड़ दूँ
कोशिश करना ?

दीये को पता है,
सूरज से उसका
क्या है रिश्ता ।
सूरज को पता है,
दीये बिना उसका
कोई नहीं अपना ।
सूरज का भरोसा है,
मिटटी का मामूली दीया ।
फिर मैं कैसे छोड़ दूँ
कोशिश करना ?

दीये ने कभी नहीं चाहा
सूरज की जगह लेना ।
बस अपना कर्तव्य जाना
चुपचाप जलना ।
अधीर ना होना ।
उजाले की आस बनाए रखना ।
अँधेरे में अलख जगाए रखना ।

एक मामूली मिट्टी का दीया
जब अकेला अकंपित डटा रहा,
तब मैं कैसे छोड़ दूँ
कोशिश करना ?




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