Wednesday, 15 July 2015

अच्छे और बुरे से परे


अच्छे और बुरे,
इनकी परिभाषा के परे 
सत्य 
मैंने जाना है ।  
अनुभव ही पैमाना है ।
गहरे पानी पैठ कर 
पहचाना है । 
जिस समय 
जो सही लगे,
वही करे,
तो बंदा 
खरा होता है ।
अच्छे बुरे का मापदंड 
ठीक उसी वक़्त 
तय होता है,
जिस वक़्त 
निर्णय लेना होता है ।
आदमी से बड़ा 
वो लम्हा होता है,
जब सच्चाई की 
कसौटी पर 
उसका सारा चिंतन 
दाँव पर लगा होता है ।


1 comment:

Shams Noor Farooqi said...

ओये होये। बड़ी जल्दी जान लिया। सत्य जान लिया भाई। अब क्या बचा जानने को? सत्य से ऊपर क्या है भला? चलो दूकान बन्द करो अब।

अच्छे और बुरे की परिभाषा के परे सत्य मैंने जाना है....... आश्चर्य है। यह बात तेरी क़लम से निकली है!!! घोर आश्चर्य। कोई सन्त या महात्मा कहता, तो भी मैं आश्चर्य करता। उसके लिये भी आसान नहीं यह। कविता अगर यहीं रुक जाती, और कवि की कल्पना में पूर्ण होती, तो सृष्टि एक क्षण को ठहर ज़रूर जाती, कि देखें तो; कौन पैदा हो गया ऐसा? किसने क्या जान लिया?

पूरी कविता पर आ जायें अब – तो मुबारकबाद। पहली बार इस प्रकार के किसी विषय पर एक अच्छी कविता पढ़ रहा हूँ। वरना पता नहीं क्या क्या अगड़म बगड़म लिखती रहती है। जो पहली कविता मैंने तेरी पढ़ी थी वह धरा की नैसर्गिक सुन्दरता का वर्णन कर रही थी। माँ गंगा की धारा बह रही थी उसमें। मुझे सहज ही पसंद आ गयी थी। और मैंने हमेशा माना कि तेरा क्षेत्र बस वही है। क्योंकि जब भी तू वहाँ से बाहर आई, तेरे क़दम डगमगा गये।

आज नहीं डगमगाये। हमेशा जब तेरी कविता पढ़ता हूँ, तो दिल में होता है – कि बिटिया है। छोटी है अभी। उमर ही क्या है। थोड़ा ऊपर नीचे कुछ हो गया, तो चलता है। छोड़ो। जाने दो। मगर आज बच्ची बूढ़ी अम्मा हो गई है, जिसने जीवन जिया है, समझा है, और अनुभव से सीखा है।

बंदा – शब्द न जाने कहाँ से ले आई है तू बीच में। भाषा प्रवाह में यह शब्द कांटे की तरह चुभा है। कांटा कील बन कर कविता की धरती पर जा धंसा है। उस कील की धुरी पर कविता नाच गई है पूरी। इससे कविता को नये आयाम मिल गये हैं। अनेक दिशायें मिल गई है। चाहे जिस दिशा में चाहो मोड़ लो। बंदा चालबाज़ है – तो समय और हालात देख कर बात बदल लेता है। अपना काम निकालता है। बंदा बिंदास है – सही ग़लत से कोई मतलब नहीं। उस क्षण जो सामने आया वही सही है, वही सच्चाई है। बंदा जीवन की समझ रखने वाला है – उस क्षण को समय और अनुभव के तराज़ू पर तौल कर सही निर्णय लेता है। बंदा सन्त प्रकृति है..... तो इसी तरह न जाने अर्थ निकलते हैं, और आगे की कविता उसी अर्थ के अनुसार बदल जाती है।

चाहे जो अर्थ ले लो। कविता पूरी है। अच्छी है। कामयाब है। ख़ुश रह तू। लिखती रह॥

नमस्ते

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