Saturday, 28 September 2013

जीवन उत्सव है




जीवन उत्सव है । 
पंछियों का कलरव है ।
जुगनुओं की जगमग है ।
नूपुरों की छन - छन है ।
चूड़ियों की खन - खन है ।   
पायल की छम - छम है ।
जीवन उत्सव है ।

जीवन उत्सव है ।
ढोलक की थाप है ।
अनचीन्हा राग है ।
मेंहदी की छाप है ।
हवन का ताप है ।
विदूषक का स्वांग है ।
जीवन उत्सव है ।

जीवन उत्सव है ।
पग की थिरकन है ।
ह्रदय की धड़कन है ।
गीत की सरगम है ।
स्वप्नों की करवट है ।
समय की सिलवट है ।
जीवन उत्सव है ।

जीवन उत्सव है ।
पूजा की शुभ वेला है ।
त्यौहारों का मेला  है ।  
पुरुषार्थ अलबेला है ।
आस्था की अनुपम लीला है ।
जिजीविषा की पाठशाला है ।
जीवन उत्सव है ।

जीवन उत्सव है ।
पंचतंत्र की कथा है ।
भावुक मन की व्यथा है ।
अनुभूति की यात्रा है ।
अंतर्मन की कविता है ।
कर्म और कर्त्तव्य की गीता है ।
जीवन उत्सव है ।


                               

3 comments:

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : भारतीय संस्कृति और कमल

noopuram said...

dhanyawad Jha Saahab !

Shams Noor Farooqi said...

पहला विचार जो दिल में आया - (मुंह पर हाथ रख कर) हॉ!!! यह क्या लिख दिया है? ये कौन सा जीवन है?
ऐसा लिखना चाहिये क्या? अरे, भ्रष्टाचार पर लिखिये, व्यभिचार, बलात्कार पर लिखिये। जीवन पर ही लिखना है तो उसमें कितनी परेशानियाँ हैं, उन पर लिखिये। हर बुराई पर लिखिये। और फिर उस बुराई की बुराई करिये। बुरा करने वालों को गालियां दीजिये। जब तक कविता में नकारात्मक तत्व ठूंस ठूंस कर न भरे हों, कविता करने का क्या फायेदा? ऐसी सकारात्मक कविता कौन पढ़ेगा इस जमाने में?

अब कविता पर आते हैं - क्या बात है। पंत जी याद आ गये। जीवन के प्रति हम जो भी दृष्टिकोण रखें, जीवन वैसा ही है। यही तो जीवन है। उत्सव ही है। कलरव, जगमग, छन-छन, खन-खन, छम-छम जीवन में हर तरफ बिखरे हुये हैं। बस हमें उनके प्रति अपने आँख और कान ही तो खोलने हैं, जो हमने बंद कर रखे हैं। ढोलक की थाप, ह्रदय की धड़कन, पूजा की बेला, हर पंक्ति जीवन का इतना अच्छा व्याख्यान है कि हम यहाँ किसे किसे और क्या क्या लिखें। यह कविता ख़ुद अपने भावुक मन की व्यथा बन गई है। यह स्वयं में वह गीता है जिसे आज शायद हर किसी को पढ़ने की आवश्यकता है। मगर वह दृष्टि है किस के पास जो इसको समझ सके?

ख़ुश रहें नूपुर। लिखती रहें। ऐसे ही लिखती रहें, कोई पढ़े या न पढ़े। कहती रहें, कोई सुने या न सुने। मैं एक बात बताऊँ। वो जो है न मुरली वाला। जिसकी बांसुरी की धुन पर यह सृष्टि चलती है। वह सुन रहा है। और सुन कर मुस्कुरा रहा है॥

नमस्ते