Sunday, 15 July 2012

कालीदह लीला


कन्हैया की
कालीदह लीला,
जब भी देखी
मन में, एक प्रार्थना का
स्वर मुखर हुआ ..
देखना..
कृष्ण कन्हैया !
जब-जब अनुचित भावों का
नाग कालिया,
मेरे मन में
फन उठा के,
मेरी मानवीयता को ललकारे,
तुम हमेशा
उसे वश में करना.
और नाग नथैया
ऐसा नृत्य करना ..
अंतर झकझोर देना,
ऐसी बांसुरी बजाना  ..
बिखरे सुर जोड़ देना,
सम पर लाकर छोड़ देना .

अहंकार बने पर्याय.. सदाचार का,
ऐसा आत्मबल और भक्ति देना .




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