Tuesday, 4 April 2017

जिसे छिन - छिन गढ़ा गया . .


कविता है, 
कर्म की भूमिका ।

पहले कभी थी ,
मन की व्यथा 
अथवा जीवन की कथा ।
कभी - कभी कल्पना ,
अनुभव की विवेचना ।
और हमेशा 
सरलता की आभा  . . 
प्रसन्न निश्छल ह्रदय की 
मयूरपंखी छटा ।

जाने क्या - क्या
अनुभूति की गठरी में 
जाने - अनजाने जुड़ा ,
या घटा  . . 
जाने 
स्वयं ही गया ठगा ।

जो बचा ,
जो सहेजा गया -
छिन - छिन गढ़ा गया  . . 
वही बनी कविता ।
          

Saturday, 18 February 2017

कमाई


"पाँच रुपये का गम देना" . . 
स्टेशनरी की दुकान पर  
एक बच्चे ने कहा  . . 
तो हँसी आ गई !

मन में सोचा -
बच्चा है !
तब ही 
पैसे देकर 
ग़म खरीद रहा है !

मासूम है !
दुनिया की 
रवायतों से 
अनजान है,
सो ग़म का 
सही इस्तमाल करना 
जानता है !
ग़म पचाना 
जानता है !
सो पैसे देकर 
ग़म खरीदने की हिमाक़त 
कर रहा है !

बड़ा होता 
तो कहता  . . 
भई खरीदना ही है 
तो खुशी खरीदो !
दिल का सुकून खरीदो !
ग़म तो मुफ़्त में 
मिलता है !
बिन बुलाया 
मेहमान है !
आ जाए तो फिर           
जाने का नाम ना ले !
और खुशी ?
ढूँढ़े से नहीं मिलती !

वही तो !
वो बच्चा है  . . 
उसे भी पता है,
खरीदने से
खुशी नहीं मिलती !
ये बाज़ार में 
बिकने वाली 
चीज़ नहीं !

ये नियामत है -
खुशी और 
दिल का सुकून !
अपनी मेहनत से और  
अपनों की दुआओं से 
फलती है !
ये मिलती नहीं,
कमाई जाती है !  

       

Monday, 13 February 2017

दुःख के लिए जगह मत छोड़ो




सुख इतना उपजाओ मन में, 
दुःख के लिए जगह मत छोड़ो।  

मिट्टी में बीज बो कर देखो। 
फिर देखो कितनी खुशी मिलेगी। 
जब मिटटी में अंकुर फूटेगा,
और सींचोगे तो फूल खिलेगा। 

सुख इतना उपजाओ मन में, 
दुःख के लिए जगह मत छोड़ो।  

दोस्त किसी के बन कर देखो। 
फिर देखो कितनी खुशी मिलेगी। 
उसका दुःख सुलझाओगे जितना,
अपने सुख का पता मिलेगा। 

सुख इतना उपजाओ मन में, 
दुःख के लिए जगह मत छोड़ो।  

टूटी चीज़ों को जोड़ के देखो। 
फिर देखो कितनी खुशी मिलेगी। 
जब - जब जोड़ोगे टूटा खिलौना,
बच्चों का निश्छल प्यार मिलेगा। 

सुख इतना उपजाओ मन में, 
दुःख के लिए जगह मत छोड़ो।  

भार उठा अपनों का देखो। 
फिर देखो कितनी खुशी मिलेगी। 
हर दिन माँ - बाप के पैर दबाना,
भारीपन मन का उड़न - छू होगा। 

सुख इतना उपजाओ मन में, 
दुःख के लिए जगह मत छोड़ो।  

बेरंग सतहों को रंग कर देखो। 
फिर देखो कितनी खुशी मिलेगी। 
सूनी दीवारें,कैनवस,कॉपी,हथेली हो, 
तीन कनस्तर या लकड़ी का टुकड़ा। 
कुछ मत छोड़ो ! सब कुछ रंग दो !
जीवन का रंग क्या खूब चढ़ेगा !

सुख इतना उपजाओ मन में, 
दुःख के लिए जगह मत छोड़ो।  




Saturday, 11 February 2017

कोई सुन रहा है





कई बार 
ऐसा होता है  . . 
जब धूप ढ़ल रही होती है,   
अंतर्मन में कहीं 
सूर्य अस्त होने लगता है ।

बहुत कुछ कहना होता है,
पर शब्द पर्याप्त नहीं होते ।
बहुत कुछ कहना होता है ,
पर कोई सुनने वाला नहीं होता ।

उस वक़्त, 
अगर ध्यान से देखो 
और महसूस करो, 
सर पर तुम्हारे नीला आसमान 
अपना प्यार भरा 
हाथ रख देता है । 

पेड़ हाथ हिला-हिला कर 
अपनी छाँव में बैठने को बुलाते हैं ।
गौरैया का लगा रहता है 
आना-जाना  . . 
क्यों तुम पाते हो अपने को अकेला ?

नन्हे पौधों पर 
हौले-हौले हिलती 
हरी कोमल पत्तियां, 
गुनगुनी धूप में खिले 
किसिम - किसिम के फूल 
मुस्कुराते हैं 
और देते हैं 
मौन आश्वासन  . . 
कोई जान रहा है 
तुम्हारे मन की बात  . . 
कोई सुन रहा है ।   


Sunday, 5 February 2017

वर दे माँ !


माँ सरस्वती वर दे !
मन के मौन स्वर
मुखर कर दे !
वर दे !

वरद हस्त
शीश पर रख दे !
मस्तक पर
जिजीविषा का तिलक कर दे !
आत्मबल का चन्दन लेप दे !
स्वाभिमान लिख दे !
वर दे !

भवितव्य का सामना करने का
साहस दे माँ !
भाग्य को बदलने का
मनोबल दे माँ !
संघर्ष में सुख खोजने की
दृष्टि दे माँ !
विषम परिस्थितियों को
अनुकूल बनाने की
शक्ति दे माँ !
बालपन की
सहज बुद्धि दे माँ !

और यदि कुछ भी ना देना चाहे !
तो जो है उसे स्वीकारने
और सँवारने का
संकल्प दे माँ !

प्रस्तर से प्रतिमा गढ़ने की प्रतिभा ..
हर हार को
फूलों के हार का उपहार
समझने की
सरलता दे माँ !

वर दे माँ !
आशीष दे माँ !
जीवन के मौन स्वर
मुखर कर दे माँ !
अंतर की ज्योत
प्रखर कर दे माँ !
आशीष दे माँ !
माँ सरस्वती वर दे माँ !


Monday, 9 January 2017

समझो महिमा !

कोल्हू का बैल 
उन्हें चाहिए  . . 
आकाओं को ।

कोल्हू का बैल 
जो कभी चूँ तक ना करे ।
जो कहें, बस उतना करे । 
बस तेल बढ़िया निकलना चाहिए,
चारे का इंतज़ाम तो हो जाएगा ।

सवाल मत पूछा करो  !
जी हजूरी किया करो ।
और खुश रहा करो ।
सर झुका कर चला करो !
और एक ही लीक पर चला करो !
देखो ! कोल्हू के चक्कर 
पूरे मनोयोग से लगाया करो !
हम जो कहें करते जाया करो ।

सोचा मत करो ।
सोचने से ध्यान में खलल पड़ता है ।
केवल इस बात का ध्यान करो  . . 
कोल्हू का बैल नहीं रहा 
तो कोल्हू का क्या होगा ?
बना बनाया खेल बिगड़ जाएगा ।

तेल ना निकला 
तो क्या होगा तुम्हारा ?
कहाँ जाओगे ? क्या खाओगे ?
चारे का भी जो जुगाड़ ना हुआ ?
तो क्या होगा ?
क्या करोगे तुम ?
एक बैल कोल्हू की परिक्रमा के सिवा 
और कर भी क्या सकता है ?
उसे तो कोल्हू के चारों तरफ़
घूमने के सिवा 
कुछ आता ही नहीं  . . 
कभी सीखा ही नहीं  !
नहीं ! नहीं ! ये ठीक नहीं !
जितनी दूर देखो 
आँखों से पट्टी हटा कर  . . 
संभावनाएं नज़र आती हैं !
संभावनाओं का आभास होना भी 
खतरे से ख़ाली नहीं !
तख़्ता पलट सकता है !
विप्लव हो सकता है !
इस पचड़े में ना पड़ो तो अच्छा !
वरना खुल जाएगा कच्चा चिटठा !    

तुम एक निरे बैल !
तुम्हारी औकात ही क्या ?
मंडी में तुमसे हज़ार मिलते हैं !
चलो छोडो ! तुमसे बात करने का क्या फ़ायदा ?
तुम ठहरे निरे बैल !

सोच लो !
कोल्हू से बंधे रहे तो जीवन कट जाएगा ।
कोल्हू से बंध कर
अथक परिश्रम कर  . . निर्द्वन्द जीवन जियो !
सुनो ! कर्म ही जीवन है !
चुपचाप चलते रहो लीक पर !
तेल निकलता रहेगा ।
तुम्हारा भला होगा ।

कोल्हू का बैल कभी घोड़ा नहीं हो सकता !
याद रखना !
छोड़ो फिजूल सपनों के बहकावे में आना !
काम करो ! और निरंतर पाठ करो !
समझो कोल्हू के बैल की महिमा !


कांच

जब जब मन 
कांच की तरह 
चकनाचूर हुआ  . . 
और कई बार हुआ  . . 
एक एक टुकड़ा 
मैंने सहेजा,
और संभाल कर रखा ।
उनमें बार - बार 
अपना अक्स देखा 
और सोचा  . . 

चलो ये भी कोई 
बुरा सौदा तो नहीं !
टूटी चीज़ों को जोड़ कर 
एक बेजोड़ कलाकृति बनाना,
एक नए अस्तित्व  . . 
एक नए व्यक्तित्व को 
जन्म देता है । 
टूट कर बिखरने को भी 
एक अर्थ देता है ।
सुंदरता देता है ।
टूटी आस्था को 
जोड़ देता है  . . 
नाम के लिए ही सही ।

कुछ देर के लिए ही सही 
हौसला तो देता है ,
बिखरे कांच समेटने का,
जोड़ जोड़ कर 
एक नयी इबारत गढ़ने का ।
फिर नए उत्साह से जीने का ।         

       

नमस्ते

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