रविवार, 2 अक्टूबर 2011

मुझे जाना है दोस्त





वाकई
बुरा मत मानना दोस्त.
दोस्त हो तुम.
तुम्हारे साथ वक्त गुज़ारना
गप्पें लङाना
घंटों ..
असल में बङा
मज़ेदार होता है,
जैसे धीरे-धीरे
पान चबाना
और अड्डेबाज़ी का
लुत्फ़ उठाना..
पर मुझे जाना है दोस्त.

मुझे जाना है दोस्त.
अरसा हुआ
बीवी से नहीं पूछा,
कैसे घर चलाती है
बिना कोई शिकायत किए ?
नलके से बूंद बूंद
टपकते पानी जितने
चंद रूपये
पूरे पङते हैं कैसे ?

मुझे जाना है दोस्त.
माँ के पास
कुछ देर बैठना
और पैर दबाना
चाहता हूं
बहुत दिनों से.
जानता हूं
कहेगी कुछ नहीं,
तरसती रहेगी
दो बोल के लिए.
बुढापे में
हाङ नहीं दुखते जितने,
टोचते हैं उतने
दुखङे कहे-अनकहे.

मुझे जाना है दोस्त.
सुना-अनसुना
बहुत किया,
अब बहुत हुआ.
जिन्होंने पैरों पर खङा किया
उन बाबूजी के
घुटनों में
अब दर्द रहता है.
पाल-पोस कर बङा किया
जो हो सका उन्होंने किया..
अब उनका हाथ तंग रहता है.
ज़रूरत के पैसों का
तकाज़ा करना,
उन्हें अटपटा लगता है.
उनके साथ बाज़ार-हाट
कॉलोनी के पार्क तक
साथ-साथ जाऊं तो
समझ में आये
उन्हें क्या चाहिए.

मुझे जाना है दोस्त.
बहुत दिन हुए
बहन के घर गए.
कुछ नहीं बस,
मुझे देख कर
दो बातें कर
उसका चेहरा खिल जाता है.
और मुझे चैन पङ जाता है.

मुझे जाना है दोस्त.
पिछले दिनों मुझे लगा
मेरे भाई के
मन में
है कोई दुविधा.
बात क्या है यदि मैं जान पाता,
तो शायद कोई हल सुझाता
या बातें ही करता,
उसका मन हल्का हो जाता.
कई दिनों से
बस आते-जाते मिले,
सोचता हूं रोज़ शाम को
शतरंज खेली जाये
और वक्त की
चाल समझी जाये,
मुश्किलों को मात दे दी जाये.

मुझे जाना है दोस्त.
बच्चों के गिले-शिकवे,
स्कूल के उनके बस्ते
खोल कर देखने
उनके खेल खेलने का
वक्त ही नहीं मिलता.
आज सोचा है,
उनको चौंका दूंगा,
कहीं घुमा लाऊंगा,
उनके साथ बच्चा बन जाऊंगा.
कहो कैसा रहेगा ?

क्या ये सब मुझसे
हो सकेगा ?
समझ रहे हो ना ?
इसीलिए आज नहीं,
फिर एक दिन कभी
तुम्हारे साथ बैठूंगा.
और कुछ नहीं करूंगा.
यारों के किस्से सुनूंगा,
चबूतरे पर लेटा-लेटा
तारे गिनूंगा,
पुराना कोई गीत गाऊंगा.

पर आज नहीं.
आज मुझे जाना है मेरे दोस्त.

सच.
बुरा मत मानना,
आज मुझे जाना है दोस्त. 





शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

तुम्हें नहीं पता




याद है उस दिन
जिस दिन
माँ ने तुम्हें
एक ज़ोर का
चाँटा मारा था
और बहुत
डॉटा था ..
उस दिन
जब तुम
रोते-रोते
सो गए थे,
तुम्हारे गालों पर
आंसू
सूख गए थे..
उस दिन
देर रात तक मॉं
जागती रही थी.
बहुत देर तक
तुम्हारे सिरहाने बैठी
हिलक हिलक कर
रोती रही
और तुम्हारा माथा
सहलाती रही..
उस दिन
बहुत देर तक.

तुम्हें पता नहीं.


रविवार, 18 सितंबर 2011

किताबें और खिलौने




जिस घर में
जगह नहीं,
किताबों
और खिलौनों
के लिए,
वो घर
बहुत छोटा है
रहने के लिए.

उस घर में
एक खिङकी
कम है,
बंजारन हवा की
चहलकदमी
के लिए,
आसमान की
चौङाई का
अंदाज़ा
लगाने के लिए,
बदलते मौसमों का
लेखा-जोखा
रखने के लिए,

उस घर में
जगह कम है,
सपनों की फसल
बोने के लिए,
नदी की तरह
अपने भीतर
बहने के लिए,
और छक कर
जीने के लिए.


गुरुवार, 11 अगस्त 2011

आखिर कब आयेगा काम करने का दिन ?





हे परम पिता परमेश्वर !
हे ईश्वर !
कब तक ?

कब तक
लोगे परीक्षा
धैर्य और
सहनशीलता की ?

किसी दिन
हिम्मत का बाँध
टूट गया तो ?
चेतना लुप्त हो गई तो ?
तो क्या होगा ?
कौन पालेगा
मिथ्या स्वाभिमान के
अवशेषों को ?

अवश्य !
इतना बोध तो है मुझे..
कोई ना कोई कारण होगा
इस बेतरतीब घटनाक़म का..
तुमने ज़रूर कुछ सोच रखा होगा..
क्योंकि,
सृष्टि में तुम्हारी
निरर्थक
कुछ भी नहीं होता.
पर क्या
जीवन सारा
दुर्भाग्य से लङने में ही
बीत जायेगा ?
लङते लङते जो सीखा
वो किस दिन काम आयेगा ?
सहते सहते ही
सारा जीवन जायेगा,
या कुछ कर दिखाने का
अवसर भी आयेगा ?

ये ठीक है कि आत्मरक्षा
सर्वोपरि है,
कुछ करने को बचे रहने के लिए..
ये भी ठीक है कि
आत्मसमर्पण की अपेक्षा,
अपनी अस्मिता की रक्षा
ज़रूरी है.
अपनी स्वतंत्रता की रखवाली
कर्तव्य निभाने की
पहली सीढ़ी है.
जब तक हम हारे नहीं,
तब तक अपनी दुनिया के
हम राजा हैं.

पर राजा अगर
किले को बचाते-बचाते ही
चुक जायेगा,
तो प्रजा की सेवा का
बीङा कौन उठायेगा ?
खुशहाली के खेत जोतने का
दिन कब आयेगा ?