शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

तुम्हें नहीं पता




याद है उस दिन
जिस दिन
माँ ने तुम्हें
एक ज़ोर का
चाँटा मारा था
और बहुत
डॉटा था ..
उस दिन
जब तुम
रोते-रोते
सो गए थे,
तुम्हारे गालों पर
आंसू
सूख गए थे..
उस दिन
देर रात तक मॉं
जागती रही थी.
बहुत देर तक
तुम्हारे सिरहाने बैठी
हिलक हिलक कर
रोती रही
और तुम्हारा माथा
सहलाती रही..
उस दिन
बहुत देर तक.

तुम्हें पता नहीं.


रविवार, 18 सितंबर 2011

किताबें और खिलौने




जिस घर में
जगह नहीं,
किताबों
और खिलौनों
के लिए,
वो घर
बहुत छोटा है
रहने के लिए.

उस घर में
एक खिङकी
कम है,
बंजारन हवा की
चहलकदमी
के लिए,
आसमान की
चौङाई का
अंदाज़ा
लगाने के लिए,
बदलते मौसमों का
लेखा-जोखा
रखने के लिए,

उस घर में
जगह कम है,
सपनों की फसल
बोने के लिए,
नदी की तरह
अपने भीतर
बहने के लिए,
और छक कर
जीने के लिए.


गुरुवार, 11 अगस्त 2011

आखिर कब आयेगा काम करने का दिन ?





हे परम पिता परमेश्वर !
हे ईश्वर !
कब तक ?

कब तक
लोगे परीक्षा
धैर्य और
सहनशीलता की ?

किसी दिन
हिम्मत का बाँध
टूट गया तो ?
चेतना लुप्त हो गई तो ?
तो क्या होगा ?
कौन पालेगा
मिथ्या स्वाभिमान के
अवशेषों को ?

अवश्य !
इतना बोध तो है मुझे..
कोई ना कोई कारण होगा
इस बेतरतीब घटनाक़म का..
तुमने ज़रूर कुछ सोच रखा होगा..
क्योंकि,
सृष्टि में तुम्हारी
निरर्थक
कुछ भी नहीं होता.
पर क्या
जीवन सारा
दुर्भाग्य से लङने में ही
बीत जायेगा ?
लङते लङते जो सीखा
वो किस दिन काम आयेगा ?
सहते सहते ही
सारा जीवन जायेगा,
या कुछ कर दिखाने का
अवसर भी आयेगा ?

ये ठीक है कि आत्मरक्षा
सर्वोपरि है,
कुछ करने को बचे रहने के लिए..
ये भी ठीक है कि
आत्मसमर्पण की अपेक्षा,
अपनी अस्मिता की रक्षा
ज़रूरी है.
अपनी स्वतंत्रता की रखवाली
कर्तव्य निभाने की
पहली सीढ़ी है.
जब तक हम हारे नहीं,
तब तक अपनी दुनिया के
हम राजा हैं.

पर राजा अगर
किले को बचाते-बचाते ही
चुक जायेगा,
तो प्रजा की सेवा का
बीङा कौन उठायेगा ?
खुशहाली के खेत जोतने का
दिन कब आयेगा ?
 


सोमवार, 1 अगस्त 2011

मौसम समाचार




मन की
जो अवस्था हो,
मौसम वैसा ही
मन पर बीतता है.

मौसम बहुरूपिया
मन पढ लेता है,
और मन का हाल जैसा
वैसा ही स्वाँग
रच देता है.

कभी बूंदाबादी..
हल्की फुहारें..
सुखद स्मृतियों के
झूले झुलाये.
कभी ऐसी ही रिमझिम
मानो गरम तवे पर
पानी की बूंद
चटके
और बिखर जाये,
यादों को
झुलसा जाये.

कभी..
पहली बारिश
मिट्टी की सौंधी
महक ले के आये,
मन को भाये,
और कभी
ये ही बारिश
अधूरी ख्वाहिशों की
घुटन भरी उमस से
जी को जलाये.

कभी..
लगातार..
बरसता पानी
फूट फूट कर
रोने का
पर्याय बन जाये,
कभी झमाझम वर्षा
मुरझाये मन मयूर की
सारी उदासी
बहा कर ले जाये.

इसीलिए,
मौसम के बारे में
जब कोई
पूछे सवाल,
मौसम बताता है
मन का हाल.