चाहिए यदि छाँव घनी शीतल
चैन से सुस्ताने को कुछ पहर ।
सींचने को जङें मिट्टी का कवच
साफ़ जल से हो कुंआ भरा ।
पीने का पानी हो सर्वत्र पर्याप्त
भरे हों ताल-तलैया, जलाशय
नील सरोवर में खिले हों कमल ।
पुष्प नहीं तो औषधीय शैवाल।
समय पर हो बारिश और घाम
मध्य खिले वसंत फिर पतझङ
शरद और शिशिर ऋतु आए,
तो एकजुट हो करें वृक्षारोपण।
चाहे किसी अपने की स्मृति में
उसकी पसंद का वृक्ष लगाएँ।
या पेङों का साया सर पर रहे,
इसलिए छायादार वृक्ष लगाएँ।
बीज हरियाली का बोएँ और सींचें
धरा की धानी चूनर धनक हो जाए ।
बुधवार, 22 अप्रैल 2026
धरा की धानी चूनर
सोमवार, 20 अप्रैल 2026
अक्षय अन्न का हर दाना
पराक्रमी पांडव पाँच और पांचाली
तपस्वी जीवन जी रहे थे वनवासी
न्यूनतम से थे संतुष्ट महलों के वासी
संचित करते नित अक्षय ऊर्जा सभी
परंपरा अनुसार रूखा-सूखा जो भी
होता था प्राप्त आपस में लेते थे बाँट
जिमा कर सबको बैठी जीमने द्रौपदी
पाया अल्प आहार समझ कर प्रसाद
इतने में कूक कोयल की दी सुनाई
पवन सुगंधित चली बूँदा-बाँदी हुई
नृत्य करते मयूर मानो आई शुभ घङी
जलज मंगल घट लिए घिरी मेघावली
द्वार पर ठाङे केशव कर में लिए वंशी
सहर्ष उठ धाए पांडव सभी देख हरि
सब भूल पांचाली भी स्वागत को उठी
किंतु क्या लगाऊंगी भोग सोच में पङी
मोहन ने आसन किया ग्रहण और बोले
सखी, भोजन परस दो भूख बहुत लगी
द्रौपदी संकोच से सिकुङी खङी रह गई
पात्र सब टटोले कुछ न था प्रभु के लिए
श्री कृष्ण भांप गए असमंजस, मुस्काए
द्रुपद सुता हतप्रभ खङी हाथ में पात्र थामे
गोविंद ने झट से पात्र ले लिया हाथों से
द्रौपदी की दृष्टि झुकी नयनों के कोर भीगे
अपनी उंगली से उठा एक चावल का दाना
माधव ने बङे प्रेम से अपने मुख में डाला
आज मैं भोग लगाकर अत्यंत तृप्त हुआ
कृष्णा सखी की आँखों से बही अश्रु धारा
गिरिधर ने द्रौपदी को भोजन पात्र लौटाया
और उसे अक्षय पात्र होने का वरदान दिया
कृष्णा भाव से अर्पित अन्न का प्रत्येक दाना
तृप्ति देता मुझे अत: अन्न का हर कण बचाना
फ़िल्म्स डिवीजन द्वारा प्रस्तुत अत्यंत प्रेरक एनिमेशन
सौजन्य आभार : फ़िल्म्स डिवीजन एवं यू ट्यूब
चित्र अंतरजाल से आभार सहित
शनिवार, 18 अप्रैल 2026
अक्षय धरोहर
जो कला, संस्कृति, परंपरा,सृजन
स्मृति में चिन्हित हो चुका है,
हमारा परिचय बन चुका है,
सदियों से समय के झंझावत
झेल कर भी टिका हुआ है,
वह हमारी अमूल्य धरोहर है ।
हमारे अस्तित्व का शिलालेख है ।
इतिहास से परे यह वो नाता है,
जो बिना कोई नाम दिए भी
हमसे जुङा है..हमारे साथ ही
चल रहा है अपनी छाप छोङता
समृद्ध हो रहा है ,आकार ले रहा है ।
सभ्यता की इस कथा का अंत नहीं होता ।
सहेज कर रखी जाती है धरोहर अवचेतन में
जब तक सौंप न दिया जाए भावी पीढ़ियों को,
तब तक पोषित करनी है, जीवन की हर विधा।
साहित्य, नृत्य, संगीत, स्थापत्य कला, संवाद
जो नदी और पर्वत श्रृंखला की तरह है स्थायी
राग जीवन का, वो सब कुछ जिसे हम कह सकें,
नि:संकोच, गौरव से सदा, अपनी धरोहर अक्षया ।