रविवार, 22 मार्च 2026

अँजुरी भर जल


नदिया का जल बहता कल-कल

नयनों से अश्रु प्रवाहित अविरल 

सूर्य को अर्पित अर्घ्य अंजुरी भर

वर्षा ऋतु में जल बरसे लगातार ।


जल ही है तरल भाव जीवन का

मिट्टी और ह्रदय को सींचता जल

गीली मिट्टी में अंकुरित होता बीज

ज़ख्मों पर मरहम जैसी नज़रें नम ।


सागर,नदी,तालाब, झील,सरोवर,

बरसात के पोखर, कुँए का जल,

ऋतुचक्र सदा संचित करता जल

हर बूँद में झिलमिलाता इंद्रधनुष !


अपार है सभी जलाशयों का बल,

पहाङ काट के राह बना लेता जल,

बाधित नहीं, दूषित नहीं करें जल

दो पाटों के मध्य समाधान सकल ।



शनिवार, 21 मार्च 2026

शायद कविता


कविता लिखी नहीं

पढी ज़रुर,सुनी भी ,

अक्सर समझी भी नहीं,

लेकिन महसूस की ..


जब अच्छी लगी

घोट कर पी ली,

नज़रअंदाज़ की

तो पेङ पर पतंग सी

उलझ गई , 

नज़र सी अटक गई।


कोई बात अकस्मात

दिल को छू गई, 

किसी के बोल 

नश्तर सा चीर गए,

किसी का कहा

झिंझोङ गया,

व्यथा की नदी

सहसा उमङ पङी,

ह्रदय की थाप

शब्दों की गहरी छाप..

भीतर कुछ बदल गई..


खाली काग़ज़ देखते ही

कलम चलने लगी,

जो बात मन में थी..

कहनी ही थी..

लिख दी...

पता नहीं तुक बनी या नहीं,

शायद कविता ही थी ।


खुशी मिली


छत पर सूखते कपङे

आङे-तिरछे कोण धूप के

रसोई में पकती दाल

पेट भर तरकारी अनाज ,


नयन भर खुला आकाश

खिङकी तक आती डाल

डाल पर खिला पीला फूल

झूला झूलती गौरैया मगन,


स्कूल के बस्ते में किताब

खेलते-कूदते बढते बच्चे

नलों में पानी सुबह-शाम 

बस-ट्रेन,रिक्शे की सवारी,


रात भर की गहरी नींद

रेडियो पर समाचार,गीत

हँसते-बोलते गाते रिश्ते

आते-जाते सलाम-नमस्ते ,


ज़िन्दगी इतना सब जीते हुए 

जाने कब सर्राटे से बीत गई ।

ढूँढने की फ़ुरसत ही नहीं मिली

जिसे कहते हैं लोग सारे खुशी !