मंगलवार, 22 मार्च 2022

कविता


 




 


कविता सुनियेगा  ?

कमल दल पर ठहरी
ओस की पारदर्शी 
प्रच्छन्न बूंदों में ,
चेहरे की नमकीनियत में,
मिट्टी की नमी में, 
मेहनत के पसीने में, 
ठंडी छाछ में, 
गन्ने के गुङ में, 
माखन-मिसरी में,
मधुर गान में, 
मुरली की तान में, 
मृग की कस्तूरी में, 
फूलों के पराग में, 
माँ की लोरी में, 
वीरों के लहू में, 
मनुष्य के हृदय में 
जो तरल होकर 
बहता है, 
उसे कहते हैं हम
कविता ।

सोमवार, 21 मार्च 2022

गौरैया अब मत जाना


बचपन से आदत थी ।
गौरैया के चहचहाने,
गहरे से हल्के नीले होते
नभ में धुंधले पङते तारे  
और उजाला होने पर
आंख खुलती थी ।
मानो गौरैया वृंद 
आता था जगाने 
बेनागा हर सुबह ।

जनमघुट्टी में घोल कर
एक बात माँ ने 
समझाई थी ।
इंसानों और पंछियों को
पीने का पानी और 
चुगने को दाना
पहले परोसना ।
फिर दिनचर्या 
आरंभ करना ।

समय बीता ।
बचपन की सहेलियों का
जिस तरह कोई
पता न था,
ठीक वैसे ही गौरैया का
घर में आना-जाना
कम होता गया ।
कुछ ख़ास फ़र्क नहीं पङा ।
बस नींद का उचटना
उचटना आम हो गया ।

फिर एक दिन सहसा
कानों में पङी वही
बचपन वाली 
गौरैया के चहचहाने 
का मधुर गुंजन ।

चारों तरफ़ देखा
मुंडेर पर सामने 
हो रहा था बाक़ायदा 
गौरैया सम्मेलन !
शोर कभी नहीं लगा
चिङियों का चहचहाना ।

घोंसला भी बना ।
आवभगत में बना-बनाया 
नीङ भी जुटाया गया ।
मिट्टी का सपाट-सा
जल का पात्र रखा गया!
दोबारा जुङ गया नाता ।

अब अकेलापन नहीं सताता ।
सूनापन भी नहीं सालता ।
छोटी-सी गौरैया का
जल में खेलना दाना चुगना ..
इतना अपनापन अनुभव होता,
मानो मुट्ठी में धङकता हो
ह्रदय मेरा और गौरैया का ।

शनिवार, 19 मार्च 2022

रंगरेज़ कोई


रंगरेज़ कोई छुप कर आता है रोज़ ।
सूरज उगते ही बिखेर देता चहुँ ओर
सोने - सा सुनहरा रंग आसमान पर ।
और ऐसे ही रंगता जाता सारा संसार ।

खिलते कमलों को रंग देता गुलाबी, 
झरते हरसिंगार के धवल भाल पर,
केसरिया तिलक लगाता उठ भोर ही ।

वृक्षों को रंग देता हरा,सांवला भी कभी ।
फूल-पत्ती,पंछी, सतरंगी, मत पूछो जी !
चित्र में रूपहले रंग भर देती ज्यों मुन्नी !

तोता हरियल, गौरैया भूरी-सी, मोरपंखी !
मैना काली, अनगिनत रंगों की फुलवारी ।
रंगरेज़ की अदृश्य कूची मानो जादूई छङी । 
ज़रा छूते ही बहने लगती रंगों की नदी - सी !

रंगों मे रंग घोल - घोल कर ही
रंगरेज़ लगा देता रंगों की झङी !
रंगों का मेला, रंगों भरी बारादरी 
पचरंगी घाघरा, सतरंगी चूनरी !

रंगों की दुनिया में कोई कमी नहीं ।
बस चाह हो,हर रंग में,रंग ढ़ूँढ़ने की ।

फीकी न पङे नज़र रंग देखने की ।
रंगरेज़ हर रोज़ लगाता रहता फेरी ।
बेरंग न रह जाए किसी की ज़िन्दगी ।