रविवार, 21 मार्च 2021
गुरुवार, 18 मार्च 2021
चाहे जो हो चहचहाना
सुन री गौरैया
तेरी लूँ मैं बलैया !
जब से तूने मेरे घर में
अपना घर बसाया
दिन फिर गए हैं ।
दिन उगता है,
दिन ढ़लता है,
चहकते हुए ।
एक अनकहा
अपरिभाषित रिश्ता
जुड़ गया है तुझसे ।
फ़िक्र रहती है तेरी
और तेरी गृहस्थी की ।
किसी अपने की ही
चिंता होती है ना ।
उस दिन सवेरे
उठते ही देखा ।
तेरा एक बच्चा
घोंसले से नीचे
गिर गया था ।
मरा पड़ा था ।
जाने ये कब हुआ !
कैसे हुआ !
पता ही नहीं चला ।
कलेजा टूक हो गया ।
हम सब रोज़ाना
देखते रहते हैं,
तेरी गृहस्थी
बड़ी होते हुए ।
कैसे बच्चे चोंच खोले
घोंसले से बाहर झांकते
बाट जोहते थे तेरी ।
और तू अपनी चोंच से
उनकी नन्ही चोंच में
डालती थी दाने ।
कैसे वो बच्चे
सीखते थे उड़ना
जब पंख निकल आते थे ।
फुदकते - फुदकते
पंख खोलते और टकराते
गिरते उड़ते गिरते उड़ते
एक दिन सीख गए उड़ना ।
कैसे मैना और कबूतर आते
हर वक्त तुम्हें डराते
घोंसला हथियाने के लिए ।
और तुम आसमान
सर पर उठा कर
सचेत कर देते थे हमें ।
हम दौड़ते आते बचाने
कबूतर और मैना उड़ाने !
कहां से तुम आईं हमें
जीवन का पाठ पढ़ाने ।
कभी अपनी मदद करना
कभी किसी की मदद लेना ।
पर पंख फड़फड़ाते - फड़फड़ाते
फिर पंख फैला कर धीरे-धीरे
निर्द्वंद उड़ना सीखना ।
नीङ बनाना, बसाना, फिर उड़ जाना ।
दाना चुगना, पानी पीना और उड़ना ।
तिनका - तिनका जोड़ना सुख
और चाहे जो हो चहचहाना ।
तेरी लूँ मैं बलैया !
जब से तूने मेरे घर में
अपना घर बसाया
दिन फिर गए हैं ।
दिन उगता है,
दिन ढ़लता है,
चहकते हुए ।
एक अनकहा
अपरिभाषित रिश्ता
जुड़ गया है तुझसे ।
फ़िक्र रहती है तेरी
और तेरी गृहस्थी की ।
किसी अपने की ही
चिंता होती है ना ।
उस दिन सवेरे
उठते ही देखा ।
तेरा एक बच्चा
घोंसले से नीचे
गिर गया था ।
मरा पड़ा था ।
जाने ये कब हुआ !
कैसे हुआ !
पता ही नहीं चला ।
कलेजा टूक हो गया ।
हम सब रोज़ाना
देखते रहते हैं,
तेरी गृहस्थी
बड़ी होते हुए ।
कैसे बच्चे चोंच खोले
घोंसले से बाहर झांकते
बाट जोहते थे तेरी ।
और तू अपनी चोंच से
उनकी नन्ही चोंच में
डालती थी दाने ।
कैसे वो बच्चे
सीखते थे उड़ना
जब पंख निकल आते थे ।
फुदकते - फुदकते
पंख खोलते और टकराते
गिरते उड़ते गिरते उड़ते
एक दिन सीख गए उड़ना ।
कैसे मैना और कबूतर आते
हर वक्त तुम्हें डराते
घोंसला हथियाने के लिए ।
और तुम आसमान
सर पर उठा कर
सचेत कर देते थे हमें ।
हम दौड़ते आते बचाने
कबूतर और मैना उड़ाने !
कहां से तुम आईं हमें
जीवन का पाठ पढ़ाने ।
कभी अपनी मदद करना
कभी किसी की मदद लेना ।
पर पंख फड़फड़ाते - फड़फड़ाते
फिर पंख फैला कर धीरे-धीरे
निर्द्वंद उड़ना सीखना ।
नीङ बनाना, बसाना, फिर उड़ जाना ।
दाना चुगना, पानी पीना और उड़ना ।
तिनका - तिनका जोड़ना सुख
और चाहे जो हो चहचहाना ।
सोमवार, 8 मार्च 2021
नदी चाहती है केवल बहना
चाँद का झूमर सितारों की बाली,
किरणों का हार चुनरिया धानी ।
भाता है मुझको सजना संवरना,
हर दिन खुद को खुशियों से रंगना ।
लेकिन ठहरो ज़रा मेरी बात सुनना,
बस इतना ही तुम मुझको न समझना ।
कभी मेरे भीतर बहती नदी को,
तट पर बैठे-बैठे महसूस करना ।
कल-कल अविरल शांत बहता जल,
लहर-लहर उमङता भावों का स्पंदन ।
कभी सुनना ..समझ सको तो समझना,
हर नदी की विडंबना, यही रही हमेशा
समय के दो पाटों के बीच बहना ।
घाटों की मर्यादा का पालन करना ।
देखो तुम इसे उलाहना मत समझना ।
मुझे तुमसे बस इतना ही था कहना ।
नदी चाहती है केवल बहना ।
स्वीकार है, अंतर में समेटना
विसर्जित हो जो भी आया बहता ।
गहराई में सदा हो रहा मंथन ।
तल में निरंतर हो रहा चिंतन ।
यही तो है इस जग की विषमता ,
नदी के सहज प्रवाह को रोकना
बन जाता है बाढ़ की विभीषिका ।
मेरे बहाव में निश्चिंत नाव खेना ।
पर मेरे भीतर बहती है जो यमुना,
उस नदी का सदा सम्मान करना ।
जब तक जल है पावन, बहने देना ।
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