खुश रहने को
कौन बहुत सामान चाहिए !
सुबह जल्दी आँख खुली
खुश हो गए !
एक नई चिड़िया देखी
खुश हो गए !
बड़े दिनों में चिट्ठी आई
खुश हो गए !
आज चहेती सखी मिली
खुश हो गए !
गमले में इक कली खिली
खुश हो गए !
नल में पानी देर तक आया
खुश हो गए !
मुश्किल सवाल हल हो गए
खुश हो गए !
अच्छा-सा इक गीत सुना
खुश हो गए !
नानी ने नई कहानी कही
खुश हो गए !
बाबूजी ने शाबाशी दी
खुश हो गए !
माँ की गोद में सो गए
खुश हो गए !
छोटी-छोटी खुशियाँ
चाबी भर देती हैं,
मन तो एक खिलौना है
झट चल देता है !
चलते-चलते मिलती है,
कोई राह नई !
खुशियों की
कड़ियाँ जुड़ती हैं ।
लहर लहर से
एक नदी बन जाती है ।
बड़ी खुशी पाने के लिए
खुश रहना आना चाहिए ।
वर्ना खुश होने को
कौन बहुत सामान चाहिए !
एक पेड़ का
धराशायी होना,
टूट कर गिरना,
हतप्रभ कर देता है ।
एक सदमे की तरह
आघात करता है ।
कुछ तोड़ देता है
अपने भीतर ।
एक पेड़ को
ठूंठ बनते देखा
तो लगा,
क्या फ़र्क है,
पेड़ के सूखने
और भावनाओं के
जड़ हो जाने में ?
इसीलिए जब
ठूंठ भी ना रहा,
हृदय की तरल
अनुभूति भी
जाती रही ।
जड़ों के बिना कोई
जी पाता नहीं ।
टिक पाता नहीं ।
पेड़ हो या आदमी ।
जा रहे हो
तुम अपने रास्ते
किसी काम से ।
तभी देखा
रास्ते के किनारे
कोई बेचारा
चोट खाया
पड़ा हुआ था ।
कोई ना मदद को
आगे आ रहा था ।
दिल बोला
हाथ बढ़ा ।
कर सहायता
अस्पताल पहुँचा ।
दिमाग़ बोला,
क्या फ़ायदा ।
ये ना बचेगा ।
उल्टा तू फँसेगा ।
दिल फिर बोला,
बहाने न बना !
कोशिश तो कर जा
जान बचा !
दिमाग़ फिर अड़ा
कोई न कोई तो
पहुँचा ही देगा ।
तू चल ना !
किसकी सुनोगे भैया ?
कैसे लोगे फ़ैसला ?
सोचने का समय
लिए बिना,
दिल जो पहली दफ़ा
रास्ता बताता है,
सही बताता है ।
रास्ता पार कैसे होगा ?
ये तिकड़म लगाना
दिमाग़ को
बेहतर आता है ।
किसी बात को,
किसी काम को
हाँ कहना है या
ना कहना,
ये फ़ैसला लेना
दिल से ।
पर काम को
कैसे करना है,
ये तय करना
दिमाग़ से ।
दिल की सुनना ।
दिमाग़ से काम लेना ।