बुधवार, 15 जनवरी 2020

बचपन की पतंग


खेल का मैदान 
बन गया आसमान !
धूप का दुशाला लपेट  
सूरज उचक कर 
रुई के बादल पर 
जा बैठा खुश हो कर 
देखने बच्चों का खेल !

पतंगों भरा आसमान  .. 
लो मच गया घमासान !
हवा ने बजाई विसल !   
दौड़ने लगे बच्चे सब !

धूप में चमकते उनके स्वेटर 
नीला, पीला, हरा, लाल  .. 
गुलाबी स्वेटर पर जामुनी फूल, 
शक्कर पारे से बने किसी पर,
किसी का स्वेटर पट्टीदार,
किसी का स्वेटर बूटीदार !
भूरे स्वेटर पर बनी रेल !
धानी स्वेटर पर फूलों की बेल !  
एक से एक चटक सबके स्वेटर !
इधर रेवड़ी बंट रही छत पर !

चमकीले ऊन सी मांझे की डोर !
चरखी संभाले मुन्नी कर रही शोर !
वो देखो दो चोटी वाली पतंग !
लम्बी जटा खोले नाचे मलंग ! 
चाहिए मुझे चंदोबे वाली पतंग !
दिन ढलने से पहले काटो पतंग !

सुन कर सरपट भागी काली पतंग !
उसके संग हो ली लहरिया पतंग !
पहले दी ढील फिर लिया लपेट !
चौकस नारंगी ने किया चेकमेट !
वो काटा ! चिल्ला कर उछल पड़े सब !
ध्यान हटा ! नारंगी भी झट गई कट !

खुले आसमान में बच्चों का खेल। 
खेलना, झगड़ना, फिर पल भर में मेल। 
बच्चों की उमंग , उड़े जैसे पतंग !
पतंगें भी कभी करें, बच्चों-सा ऊधम !

अजी ! काटो पतंग या कट जाए पतंग !
मिलजुल कर मौज करो सबके संग !
तिल के लड्डू और गुड़ की गजक,   
मुँह करो मीठा और बोलो मीठे बोल !


सोमवार, 6 जनवरी 2020

गुलाबी झुमके




झुमके ले लो !
बिटिया झुमके ले लो !
गुलाबी ठंड में
गुलाबी दुपट्टे संग
खूब फबेंगे तुम पर ।
गुलाब सी खिल उठोगी
बीबी इन्हें पहन कर !

गुलाबी रंग के क्या कहने !
और उस पर गुलाबी झुमके !
चेहरे की रंगत बदल देंगे !
गाल ग़ुलाबी कर देंगे !
जब हौले-हौले हिलेंगे
जी की बतियाँ कह देंगे ।

पहन के तो देखो
फिर चाहे मत लीजो
देखने के भाव ना लगते !
पहने तो फिर ना उतरते !
टूटेंगे तो नए मिलेंगे ।
पर फीके ना पड़ेंगे !
बड़े ग़ज़ब के हैं ये झुमके !
पिया के मन में जा अटकते !

बड़े काम के हैं ये झुमके !
बहरूपिये झुमके !
चाहे पर्स में बांध लो !
चाबी का गुच्छा बना लो !
या परांदे में गूंथ लो !
मेरी बात मानो !
इन्हें रख ही लो !

जब इन्हें पहन कर
किसी के मन भाओगी,
तो भौजी मुझे भी 
याद करना !

गुलाबी रंग तो है ही
दुलार और मनुहार का !
खुशियों का शगुन हैं ये  ..
जो अब हुए तुम्हारे
गुलाबी झुमके !

रविवार, 5 जनवरी 2020

गुलफ़ाम


और इनसे मिलिए !
माई के हाथों का बुना
लाल स्वेटर पहने
हरा गुलूबंद लपेटे
तबीयत से
इतरा रहे हैं !
बन-ठन के
गुलफाम बने 
चले जा रहे हैं !

श्रीमान गुलाब राय की
बेफ़िक्र मुस्कान में,
गरमाहट,
गुनगुनी धूप की नहीं..
माई की 
ममता से
डबडबाई आंखों,
काम कर-कर के
खुरदुरी हुई हथेलियों 
और ऊन-सलाई सी
दक्ष उंगलियों की है !