सोमवार, 27 मई 2019

जिजीविषा और दुआ



आज 
यह फूल खिला
उस पौधे पर,
जिस पौधे की
लगभग इति
हो चुकी थी ।

पर जब
किसी ने कहा,
चमत्कारी
होती है आशा..
और सेवा,
उस भरोसे ने
पौधा फेंकने
नहीं दिया ।

दिन-रात बस
मन में मनाया
जी जाए पौधा ।

मिट्टी खाद धूप जल
और देखभाल ने
पौधे में रोप दी
जिजीविषा ।

आशा ने
औषधि का
काम कर दिखाया ।

आज सुबह देखा
ऐसा फूल खिला !
मानो किसी ने
मांगी हो दुआ ।

रविवार, 12 मई 2019

कर्णफूल


आज ही खिले
ये फूल !
सुबह-सुबह इनकी
भीनी-भीनी
सुगंध ने
हिला कर जगाया ।

उठते ही 
स्मरण हो आया..
मोती सरीखी
जो कली थी,
संभव है
खिल गई हो !

भाग कर 
खिड़की से
झांक के देखा ।
सचमुच
फूल खिले थे !

शरारत से
मुस्कुरा के
हिल-हिल के
हौले-हौले
अभिवादन
कर रहे थे ।

दिन-प्रतिदिन
कई दिनों तक
पौधे को सींचना
पालना-पोसना
जब-तब
बार-बार देखना कहीं
फूल तो नहीं खिला !

देखते रहो !
संभव है
आंखों के सामने ही
फूल खिल जाए !

जतन कर के
पाले-पोसे
पौधे पर
जब फूल खिलता है,
उसे देखने की
खुशी से बढ़ कर
कोई खुशी नहीं होती ।

हाँ जी !
आज ही खिले
मन-उपवन में
कर्णफूल से फूल !