सुनो सुनो माँ एक दिन की बात
जब मन था मेरा बहुत उदास ।
झमाझम हो रही थी बरसात
माँ तुम क्या,कोई नहीं था पास ।
कहो किससे करता मैं संवाद ?
मन में उमङ-घुमङ रहे थे बादल
अश्रु धारा में घुल गया काजल,
घनघोर घटा-सी घिर आई रात,
नींद में सुना मंद मधुर शंखनाद
स्वप्न में मेरे आए स्वयं जगन्नाथ ।
पूर्णिमा के चंद्र से दुटी नयन
समाया जिनमें सकल भुवन,
देख रहे थे वे मुझको अपलक ।
मानो दो क्षीर सागर हों विशाल
मध्य में विराजते हों शालिग्राम ।
जिनकी दृष्टि में थी करुणा अपार
उनका अनुग्रह सृष्टि का आधार ।
"जगत के भूल सकल व्यवहार
बाहर आया हूँ स्वयं तुम्हारे पास ।
मुझसे कह दो क्या है मन में बात
कहो .. जबकि मुझे सब है ज्ञात ।"
माधव मुस्काये दोनों भुजा पसार ।
"आओ मैं ही तुम्हारा पालनहार
अंक में भर लूँ मैं तुम्हें एक बार।
दुख का नहीं करना व्यर्थ विचार
सहज सरल सेवा भक्ति का सार।"
पुलकित हो मैं उठा तत्क्षण जाग
ह्रदय में उठने लगी आनंद हिलोर,
खींचने रथ की अटूट पावन डोर
चल दिया माँ मैं भी मंदिर की ओर ।
बलभद्र, सुभद्रा सहित चक्रधर
भक्तों के संग, भक्त भाव विभोर ।
वर्षा में धुल गए कलुष समस्त
अब वही वृष्टि पावन जलधार ।
शीष पर मोरमुकुट तुलसी दल ,
हिल-डुल प्रसन्नवदन आनंदकंद
नीलमाधव महाप्रभु जय जगन्नाथ ।
शनिवार, 18 जुलाई 2026
जगन्नाथ से संवाद
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आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 20 जुलाई 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
सुंदर
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंवाह!! नीलमणि जब स्वयं आकर समझा गये तब शेष ही क्या रहा सिवाय प्रेम के भीतर भी और बाहर भी!!
जवाब देंहटाएंवाह! बहुत सुंदर ।
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