बाहर मौसम तप रहा है ।
भीतर आलस्य पक रहा है ।
अवसाद पनप रहा है ।
शिकायतों से पन्ने भर रहा है ।
हताशा का बादल घुमङ रहा है ।
पर पसीना बरस रहा है ।
घर उबल रहा है ।
सौ-सौ उलाहने दे रहा है ।
हिलना-डुलना डस रहा है !
बस करो भैया ! बिल बढ़ रहा है !
खिङकी की संध से तनिक बाहर देखो ।
देखो बाहर क्या उत्पात हो रहा है ..
मजदूर फेंटा बाँधे मरम्मत कर रहा है ।
चिलचिलाती धूप में चीले सा सिक गया है ।
काम पर जाने वाले जूझ रहे हैं..
पर किसी तरह मोर्चा सँभाले हुए हैं ।
स्कूल से छूटे बच्चे भुन कर लाल हो गए हैं ।
लोहे के चने चबाना सीख रहे हैं ।
पर सूर्य देवता हरगिज़ न पसीज रहे हैं ।
फिर भी सारे काम बदस्तूर हो रहे हैं ।
मौसम के मिज़ाज जितने बिगङ रहे हैं ।
गुलमोहर उतने ही दहक रहे हैं ।
टूट कर खिल रहे हैं..गीत बन गए हैं ।
क्यों न हम भी चलें रंग बटोरने के लिए !
देखो तपते हुए गुलमोहर खिल रहे हैं !
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