दिन जैसे जैसे खूब तपने लगेफूलों के रंग चटख होने लगेझूमर से झूमते अमलतास फूलेरास्तों के किनारे सोनमोहर बिछेछज्जे-छज्जे पर बोगनवेलिया लगेमजाल है कि कोई भी रंग छूट जाएहर मील के पत्थर पर प्याऊ बनेमिट्टी के घङे का शीतल जल मिलेरास्तों को घने वृक्षों का साया मिलेराहगीर को चलने का हौसला मिले
आपकी सदिच्छाओं को नमन नूपुर जी। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है आपकी।
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 13 अप्रैल 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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ग्रीष्म का बहुत सुंदर चित्रण, मनमोहक शब्दों में !!
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर, साथ ही याद आता है तपती धूप में, ठेले पर पने का वो मटका
जवाब देंहटाएंयार, आपने ये पंक्तियाँ पढ़कर सच में गर्मी भी खूबसूरत लगने लगती है। आपने जिस तरह अमलतास, बोगनवेलिया और सोनमोहर को जिया है, वो सीधे आँखों के सामने आ जाता है। मुझे सबसे ज्यादा वो प्याऊ और मिट्टी के घड़े वाली बात छू गई, क्योंकि उसमें अपनापन और राहत दोनों दिखते हैं।
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