शनिवार, 11 अप्रैल 2026

झूमर तले


दिन जैसे जैसे खूब तपने लगे
फूलों के रंग चटख होने लगे

झूमर से झूमते अमलतास फूले
रास्तों के किनारे सोनमोहर बिछे

छज्जे-छज्जे पर बोगनवेलिया लगे
मजाल है कि कोई भी रंग छूट जाए 

हर मील के पत्थर पर प्याऊ बने
मिट्टी के घङे का शीतल जल मिले

रास्तों को घने वृक्षों का साया मिले
राहगीर को चलने का हौसला मिले

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी सदिच्छाओं को नमन नूपुर जी। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है आपकी।

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 13 अप्रैल 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

    जवाब देंहटाएं
  3. ग्रीष्म का बहुत सुंदर चित्रण, मनमोहक शब्दों में !!

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर, साथ ही याद आता है तपती धूप में, ठेले पर पने का वो मटका

    जवाब देंहटाएं
  5. यार, आपने ये पंक्तियाँ पढ़कर सच में गर्मी भी खूबसूरत लगने लगती है। आपने जिस तरह अमलतास, बोगनवेलिया और सोनमोहर को जिया है, वो सीधे आँखों के सामने आ जाता है। मुझे सबसे ज्यादा वो प्याऊ और मिट्टी के घड़े वाली बात छू गई, क्योंकि उसमें अपनापन और राहत दोनों दिखते हैं।

    जवाब देंहटाएं

कुछ अपने मन की भी कहिए