आ रही थी बहुत याद गौरैया की,
दिन भर आसपास चहचहाने की ।
चुगती थी दाना, तुलसी की मंजरी,
मिट्टी के बरतन से पीती थी पानी ।
छपाक-छपाक खेलती, नहाती थी,
पास जाओ तो फुर्र उङ जाती थी ,
फिर भी वो मेरी पक्की सहेली थी !
मेरी दिनचर्या के नेपथ्य में रहती थी,
उस पर हमेशा मेरी निगाह रहती थी ।
व्यस्त जीवन में राहत की घङी थी,
सूनेपन में चहकती सुनहरी स्मृति..
फिर घर आना गौरैया का थम गया ..
इसलिए जब सुना आज चहचहाना,
लगा लौट आया दोबारा कोई अपना ।
वो अपना जिसका होना ही बहुत था ।
गर्दन घुमा चतुर्दिक देखना संवाद था ।
क्यारी में, गमले पर, तारों पर झूलना,
छज्जे से उङ कर खिङकी पर आना,
बाहर से झाँक कर मुआयना करना ,
फिर चहकने लगना ..आश्वस्त करता ।
मुझसे तुम्हारा रिश्ता दखल नहीं देता,
लेकिन लगता है जैसे तुमने ही समझा ।
मेरे मन का मंगल गीत हो तुम गौरैया,
जहाँ भी जाओ लौट कर आना गौरैया ।
रविवार, 1 फ़रवरी 2026
लौट आना गौरैया का
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एकदम ज्यों के त्यों मेरे मनोभाव उकेर दिये आपने , बारिश के समय से मुझे गौरेया नहीं दीखी थी जनवरी दूसरे सप्ताह में जब वो धान चुनने आयी न हम खुशी से कूदने ही लगे थे।
जवाब देंहटाएंसहज,निश्छल अति सुंदर अभिव्यक्ति।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ३ फरवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर
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