धीमे-धीमे पतंग
उठ रही है ऊपर,
ऊँची आसमान में ।
उङती जा रही है,
आगे बढ़ रही है,
रास्ता बनाते हुए
सूर्य दीप बालने ।
नभ को छूते हुए
बादलों से बातें ,
किरणों की पाँतें
करती अभिनंदन।
लगभग अदृष्य डोर
बँधी है उनके हाथों से,
जो हुनरमंद क़ायदे से
खूब उङाते हैं पतंग ..
जिनकी जिजीविषा
लाँघ लक्ष्मण रेखा,
उङ चली है रचने
स्वतंत्र परंपरा नई,
आकाश नापने की ।
जब तक पतंग
कटती नहीं,
लूटी नहीं जाती ।
एक बार कट गई
तो जो लूटे उसकी !
पर.. किस काम की ?
डोर हो हाथों में
किसी के भी,
बनी है पतंग
उङने के लिए ही ।
पर पतंग के काग़ज़ की
रंग और बनावट की
बात है कुछ ऐसी !
बिजली के तार से,
पेङों की डाल से
झूलती हुई ,
छज्जों पर अटकी
रंग-बिरंगी ,
छू लेती हैं दिल को..
दीवाने पतंग के
पतंगें सहेजते,
चिपका कर देखते,
और ना उङे तो
दुछत्ती के बक्से में,
यादों की अल्बम में
रखे रहते समेट कर ।
स्मृतियों की कतरनें भी
कर देतीं मरहम पट्टी ।
किसी दिन फिर कभी
उङेगी पतंग कहीं !
आकाश के चंदोबे पे
सलमा-सितारों सी !
हवा में तैरती मलंग सी,
नीली नदी में गोते लगाती,
इठलाती, बल खाती,
उचक कर ठहर जाती
धूप की मचान पर !
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छवि : अंतरजाल / ए आय / पिकबेस्ट से आभार सहित


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