Tuesday, 7 June 2016

फिर ज़िन्दगी के क्या कहने !


बुज़ुर्गों का सर पर हाथ हो ,
अपनों का साथ हो ,
थाली में दाल - भात हो ,
फिर ज़िन्दगी के क्या कहने !

मन में विश्वास हो ,
मुट्ठी भर जज़्बात हों ,
मेहनत के दिन - रात हों ,
फिर ज़िन्दगी के क्या कहने !

प्रार्थना से दिन शुरू हो ,
दोहों से दिन बुने हों ,
छंद में दिन ढला हो ,
फिर ज़िन्दगी के क्या कहने !

क्यारी में फूल खिला हो ,
घर में मीठा दही जमा हो ,
मंदिर में दीया जला हो ,
फिर ज़िन्दगी के क्या कहने !

सुख - दुःख से बड़ा कोई सपना हो ,
सपना सच करने का हौसला हो ,
हौसला हर हार से बड़ा हो ,
फिर ज़िन्दगी के क्या कहने !


4 comments:

  1. क्यारी में फूल खिला हो ,
    घर में मीठा दही जमा हो ,
    मंदिर में दीया जला हो ,
    फिर ज़िन्दगी के क्या कहने !
    ​बहुत सुन्दर !!

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  2. धन्यवाद सारस्वतजी ।
    आपकी क्यारी में फूल खिलते रहें ।
    आपके घर में हमेशा मीठा दही जमे ।
    मंदिर में दीया जलता रहे ।

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  4. दाल भात खाना मैंने छोड़ दिया है। सो यह कविता मुझे पढ़नी ही नहीं चाहिये। दाल भात के इलावह भी जो है, वह भी बेमाने है। अब हम बुजुर्ग कहाँ से लावें। हम तो खुदै बुजुर्ग हैं। साथ वाले तो सारे मर गये कम्बखत।

    से दिन शुरू हो / से दिन बुने हों / में दिन ढला हो – ये क्या कर रही है। ज़बरदस्ती क्यों लिख रही है। “क्यारी में फूल खिला हो” और “मंदिर में दीया जला हो” के बीच में “घर में मीठा दही जमा हो” आउट नहीं हो गया??? ‘मीठा’ निकाल दे, या ‘में’ निकाल, तो भी कुछ बैठता है जाकर। अरे तो पूरा ही फ़्री-स्टाईल कर ले ना। जैसे बाक़ी सब लिखी हैं।

    यहाँ भी 2 नम्बर। कुल। 1 नम्बर मीठे दही के लिये। और 1 नम्बर मंदिर के दिये के लिये। बाक़ी सब बेकार है॥

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नमस्ते