Monday, 4 May 2015

बहुत दिनों बाद



बचपन बहुत पीछे छूट गया ।

बहुत बरस पहले कहीं ठिठका,
बस वहीँ अटक कर रह गया ।
जैसे खाते - खाते लगे ठसका  . . 
ऐसे कभी - कभी याद है आता,
और आँखें नम कर जाता ।

उस दिन कुछ ऐसा ही हुआ ।

बहुत दिनों में ननिहाल जाना हुआ ।
प्रणाम करते ही नानाजी ने कहा  . . 
अब महीना भर जाने नहीं दउंगा ।

बहुत अरसे बाद उनका ये कहना,
बालों में आती सफ़ेदी को अनदेखा कर गया ।
बचपन के किस्सों वाला पन्ना पलट गया  . . 
जिसमें था बचपन की कारस्तानियों का लेखा - जोखा  . . 
और नानाजी का बात - बात पर रोकना - टोकना ।

अब ना कोई जाने से रोकता ।
ना ही गलतियों पर टोकता ।

इसलिए जब नानाजी ने कहा  . . 
अब महीना भर जाने नहीं दउंगा  . . 

. .  तो रोना भी आया ।
और बहुत अच्छा भी लगा ।

                     

2 comments:

Saru Singhal said...

Moving! Good old days and the love of grandparents. Reminds of my granny. I lost both of granfathers even before I was born.

Shams Noor Farooqi said...

हाँ भाई। रो लो, और हंस भी लो। बचपन से जुड़ी यादें, और नाना नानी की बातें ऐसी ही होती हैं। उनकी बातों का स्नेह छू जाता है दिल को कहीं। मुझे अपने नाना अब भी याद हैं, हालाँकि मेरे बचपन में ही उनका देहांत हो गया था। उनकी बातें याद हैं। उनका ग़ुस्सा, और उनके ग़ुस्सा होने पर हमारा ज़ोर से हँसना भी याद है। ना रे। बचपन छूटा कहाँ है। मैं उसे खिड़की के बाहर खेलते हुये देख रहा हूँ।

नमस्ते