Sunday, 23 November 2014

सुखांत कथा



आजकल हमें 
सुखांत कथा ही 
भाती है । 

वजह 
जो भी हो ।
चाहे ये 
कि वास्तविक जीवन में तो  . . 
अपने चाहे से 
कुछ होता नहीं ।
क्या होगा ?
उस पर बस नहीं ।
और असल बात तो 
ये है भई,
सुखद और दुखद का 
होता है अपना - अपना कोटा । 
ज़िन्दगी में ,
सुख के सिलसिले है कभी ,
दुःख भी डट कर बैठे हैं सभी ।
वस्तुस्थिति 
परिस्थिति 
यथार्थ घटनाक्रम से 
जूझते हैं सभी ,
कभी न कभी ।
इसमें क्या नयी बात है ?

बात तो तब है जब 
कथा से जन्मे 
संवेदनशीलता ।
होनहार होकर रहे 
पर आत्मबल ना झुके ।

क्योंकि मित्रवर अब सहन नहीं होते ,
हारे हुए कथानक ।
अंत में सद्भावना प्रबल हो ,
और इस तरह कथा सुखांत हो ।

          

2 comments:

  1. हूँ, सुखांत होता क्या है वैसे? कैसे भी करम कर लो। जैसी भी भावना लेकर जियो। अन्त एक ही है। मारना पड़ता है। और मरो, तो सब रोते हैं। अच्छा आदमी मरे, तब तो रोते ही हैं; बुरा से बुरा मर जाये, तो भी कई एक दिख जाते हैं उसके अपने पराये रोते हुये। दोनों ही तरह से अन्त तो दुःख लेकर ही आया। अब कहाँ से लायें सुखांत?

    कविता की कला पर बात करने को कुछ यहाँ है नहीं। बिखरी हुई पंक्तियाँ हैं। किसी फूल की बिखरी हुई पंखुड़ियों की तरह। मगर पंखुड़ियाँ बिखर कर भी महकती तो रहती ही हैं। फिर सूख जाती हैं। हवा उड़ा ले जाती है उनको, और अक्सर रौंदी जाती हैं समय के पैरों के तले।
    मगर इनकी महक कहाँ गई? क्या ख़ुशबू मर गई? नहीं। वह तो मौजूद है। दूसरे फूल में। यह हम पर है कि हम एक सूखी पंखुड़ी पर रुक जायें, और ख़ुशबू को अपने जीवन से अलग कर लें। या फिर वह फूल जिस का अन्त हो चुका है, उसको जाने दें, और एक नया फूल ढूंढ लें।

    सृष्टि निरन्तर चलती रहती है, रुकती नहीं। ख़ुशबू महकती रहती है, मरती नहीं। जो रुक गया, वह मर गया। अन्त हमेशा दुखांत ही है। सुख का अन्त नहीं होता। मगर हमें रोज़ एक नया फूल खोजना होगा। तभी तो सदा से कहते आये हैं – जीवन चलने का नाम है।

    कथा काग़ज़ में हो, या जीवन में। जिसमें ख़ुशबू है, वही चुन ली। जब ख़ुशबू कम हुई, तो नई गढ़ ली। जीवन ख़ुशबू से है। उससे रिश्ता जोड़ लिया, तो देखो न, कभी सोचा है कि हर सुबह बिखरे हरसिंगार हर रोज़ नये होते हैं, और अंधेरा हो, तो कुछ न भी दिखे, रात की रानी ख़ुद ही तुम्हें ढूंढ लेती है।

    यह टिप्पणी जीवन पर है, कविता पर नहीं।
    खुश रहो बच्चे। अच्छे रहो। लिखते रहो।

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  2. शम्स साहब ! आप एक बात कहने जाते हैं और कविता कह देते हैं !

    आपकी बातें आशीर्वाद हैं . सर माथे पर .

    नूपुर

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नमस्ते