Saturday, 5 July 2014

परवाह

हँसने का सबब कोई भी नहीं,
फिर भी हम हरदम हँसते हैं ।
दुनिया से हमको गिला नहीं,
हम अपनी फ़िक्र खुद करते हैं ।

1 comment:

Shams Noor Farooqi said...

हट। यह क्या है? ओहो, कविता छोड़ कर शायरी पर हाथ मारा जा रहा है। अच्छा है। पूछो कि अंतर ही क्या है? भाषा का! न रे बिटिया। अंतर है नियम का। मगर नियम क़ानून कौन देखता है आज कल। देख कर करना भी क्या? न लिखने वाले को पता, न पढ़ने वाले को समझ। और समझता भी है तो समझा करे। अपनी बला से। हमें क्या। हमको तो दुनिया से कोई गिला है ही नहीं। गिला कर के भी कर लेंगे? वह तो कभी सुनती नहीं। हम ही रो रो के अपना गाल गीला कर लेंगे।

चार लाइना लिखी हैं बिटिया रानी ने। मालूम है कि इस संसार का अब तक का सब से बड़ा चार लाइना लिखने वाला कौन है? संसार के किसी कोने में, किसी भी भाषा में, अगर कोई कविता से प्रेम रखता है, तो वह उसका नाम ज़रूर जानता होगा। उसका नाम ग़ियासुद्दीन था। निशापुर में रहता था, सो ख़य्याम निशापुरी के नाम से लिखता था। हम उसे उमर ख़य्याम पुकारते हैं। लगभग हज़ार साल हो गए उसको मरे हुये। हज़ार साल से वह अपनी चार लाइना में ज़िंदा है। क्यों? बड़ी अक़ल वाला था? नहीं। अक़ल तो सब के पास होती है। मगर क्यों ग़ालिब मर के भी नहीं मारता? क्योंकि उसकी शायरी का एक एक शब्द शायरी के नियम को सिद्ध करता है।

उमर ख़य्याम अपनी रूबाईयों के लिए प्रसिद्ध हैं। रुबा का अर्थ है चार। इस लिए चार लाइन की कविता को रूबाई कहते हैं। रूबाई एक प्रसिद्ध विधा है। लोगों को बहुत पसंद आती है। मगर पसंद इसी लिए आती है कि वह हमेशा अपने नियम में रहती है।
केवल एक ही नियम मैं लिख रहा हूँ जो सब से ज़रूरी है – रूबाई का पहला, दूसरा और चौथा मिसरा (पंक्ति) हम-क़ाफ़िया होना चाहिये।

आप ने दूसरे और चौथे का क़ाफ़िया मिलाया है। सो यह रूबाई नहीं हुई। इसे क़ता कह सकते हैं। क़ता में कोई ख़राबी नहीं है। यह भी एक विधा है कविता की। मगर जो असर रूबाई से पैदा होता है, वह क़ता से नहीं हो सकता।

लेक्चर लंबा हो गया है। नाराज़ मत होना। या हो भी लेना। मगर बताना ज़रूरी है। क्योंकि कोई और नहीं मिलेगा बताने वाला। मैं तो बहुत दिन नहीं रहूँगा। अगर गुस्से से ही सही, ये छोटी छोटी बातें याद रहीं, तो आज की चार लाइना में, और कई साल बाद की चार लाइना में, एक बड़ा अंतर पैदा हो जायेगा। बुद्ध ने कहा था – मैं आखिरी बुद्ध नहीं हूँ। उमर ख़य्याम ने भी कभी नहीं कहा कि मैं आखिरी उमर ख़य्याम हूँ।

आप की कविता पर बाद में आऊँगा। मेल का जवाब भी जल्दी ही दूंगा। पेड़ से पत्ता अभी टूटा नहीं है।

खुश रहिये। लिखती रहिये।

नमस्ते

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