Thursday, 16 January 2014

स्वामी विवेकानंद



स्वामीजी, 
आपका चिर-परिचित चित्र, 
हमारे मन - मस्तिष्क पर 
बरसों से अंकित है . 
अंकित है आपकी छवि 
नोटबुक के मुखपृष्ठ पर,
दीवार पर लगे पोस्टर पर,
सिक्के पर,
डाक टिकट पर . 
हमारी दिनचर्या का 
अभिन्न अंग हैं आप . 
आप . . आप के विचार . 
पर क्या सचमुच ?

इतना बहुत है क्या ?
आपके विचार 
डायरी में नोट कर लेना ?
और दराज में सहेज कर रख लेना ?
दराज को खोलना, 
डायरी में लिखे विचारों को 
धूप - हवा देना 
भी ज़रूरी नहीं है क्या ?

विचारों को मथना . .  
आत्मचिंतन करना . . 
कर्म करना . . 
आपने यही मन्त्र दिया था ना ?

आपके विचारों के प्रकाश में 
अपना धर्म बाँचना 
और कर्म की कलम से 
श्रम की परिभाषा लिखना, 
आपकी शिक्षा को गुनना 
मुझसे हो सके, 
आशीर्वाद दीजिये ऐसा.  

आपको अर्पित कर सकूं गुरु दक्षिणा 
आत्मबल दीजियेगा इतना . 


    

2 comments:

  1. एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है। - यह बात स्वामीजी ने ख़ुद अपने अंतिम समय में कही थी। एक क्या, उनकी इच्छा तो यह थी कि भारत के हर घर, हर गाँव, हर शहर में एक विवेकानंद पैदा हो। मगर अफ़सोस कि १०० साल में भी हम एक विवेकानंद पैदा न कर सके। एक विवेकानंद तो बहुत बड़ी बात हो गई जबकि अपने को इतना उन्नतशील समझ कर हम अभी भी तमाम कुरीतियों, रूढ़ियों और धार्मिक आडंबरों में फंसे हुये हैं। स्वामी विवेकानंद का महान व्यक्तित्व और उनके उन्नत विचार केवल बच्चों की किताब का पाठ बन कर रह गये हैं।

    मगर आप की कविता की अंतिम पंक्तियों ने इस दर्द को आशा में बदल कर इसे जीवन दे दिया है। अभी भी देर नहीं हुई है, अभी भी कुछ ख़तम नहीं हुआ है..... अभी भी हम उनको भूले नहीं हैं। काश आप की इस कविता को आज के बच्चे पढ़ और समझ पाते। किस तरह आज हमने इंडिया में भारतवर्ष को खो दिया है।

    ख़ैर, यह मेरा अपना दर्द है। और आप की कविता इसको उजागर करने, और फिर शांत करने में कामयाब है। हमेशा की तरह प्रवाह सरल है। शब्द दिल से निकाल कर क़लम से होते हुये काग़ज़ पर आ गये हैं। या शायद की-बोर्ड से होकर कम्प्यूटर स्क्रीन पर। शब्दों का चयन अच्छा है, और उससे भी अच्छा यह चुनाव है कि किस पंक्ति को कहाँ पर तोड़ना है। और किसी का तो पता नहीं, मगर मेरा आशीर्वाद ज़रूर आप के साथ है। ऐसे ही लिखती रहें। खुश रहें॥

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    1. शम्स साहब नमस्ते । विवेकानंद जयंती मनाने का मन था । सो ईमानदारी से मन की बात ल्लिख डाली । कोना कोना मन का छान मारा , एक यही विचार मिला । इतना ही कहना है । करना ज़्यादा है ।

      आपकी बात सुन कर प्रोत्साहन मिलता है । शायद कल हम कुछ लिखें । शुक्रिया । खुदा हाफ़िज़ ।

      नूपुर

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नमस्ते