Thursday, 11 April 2013

रसरंग



कोयलिया ने 
मधुर गीत सुना कर 
प्रस्ताव रखा -
चलो, जीवन को 
सरस बनाते हैं .

नव पल्लव झूम उठे 
सुन कर,
सहर्ष, करतल ध्वनि की।
रंगों की पिचकारी छूटी . 

वसंत के रंगों में खिले,
हर फूल ने 
सिर हिला कर,  
और खिल कर 
प्रस्ताव का अनुमोदन किया .

जीवन का पन्ना-पन्ना,
मन के कैनवस का कोना-कोना 
रंग दिया .

और सबने 
खट्टे-मीठे 
आम सरीखे 
जीवन के हर अनुभव का 
स्वाद लिया .

समस्त सृष्टि ने 
समवेत स्वर में 
कहा -
जीवन चखने को मिला 
इतना ही बहुत नहीं क्या ?
उस पर इतने रंगों की छटा 
मन बावरा नहीं होगा क्या ?

स्वाद और रंगों से सराबोर 
ये मौसम कभी बीते ना !
मौसम बीते , ऋतु बदले ,
रंग जो चढ़े , कभी छूटे ना !


2 comments:

Shams Noor Farooqi said...

समस्त सृष्टि ने कहा - जीवन चखने को मिला, इतना ही बहुत नहीं क्या....

मुझे नहीं लगता कि ये आप बीच बीच में जान कर / सोच विचार कर ऐसा कुछ ले आती हैं, जिससे पूरी बात का अर्थ कहीं से कहीं पहुँच जाता है। इन पंक्तियों में बसंत ऋतु का या किसी बाग़ की बहार का आनंद भी कम नहीं है। किन्तु केवल एक पंक्ति जो मैंने ऊपर लिखी है, ने इस आनंद को उत्कृष्ट और विशिष्ट बना दिया है।

नव पल्लव झूम उठे सुन कर / सहर्ष करतल ध्वनि की.... बहुत प्यारा है। मेरे सामने बहुत सारी नन्ही मुन्नी सृष्टि की रचनाएँ कूदती फाँदती आ गईं।

इस कविता को मैं ठीक से जांच नहीं सकता। यह दिमाग़ से ज़्यादा दिल के क़रीब है। दिल के पास शब्द नहीं होते, भावनाएं होती हैं। उनको ठीक तरह से लिखा नहीं जा सकता। कम से कम मुझे तो लिखना नहीं आता॥

noopuram said...

apke vichar jaan kar man bahut prasann hua kyonki apne kavita waqai padhi hai.

itna samay nikal kar apne vichar likh bhejne ke liye bahut bahut aabhaar.

नमस्ते