Wednesday, 4 April 2012

हद करती हैं लङकियां




जाने क्या-क्या सवाल पूछती हैं लङकियां,
चुप रह के भी बेबाक़ बोलती हैं लङकियां.

बङी शिद्दत से मुहब्ब्त करती हैं लङकियां,
बात-बात पर देखो झगङती हैं लङकियां.

नज़ाकत की मारी ये शोख बिजलियां,
हालात को टक्कर देती हैं लङकियां.

बङे ही नाज़ों से पाली ये हमारी बेटियाँ,
कुनबा सारा का सारा संभालती हैं लङकियां.

गलतियां करने का रखती हैं हौसला,
शर्तों पे अपनी जीने लगी हैं लङकियां.

मर्दों से बराबरी की दुहाई नहीं देतीं,
किस्मत से भी बेखौफ़ उलझने लगी हैं लङकियां.

उम्मीद के सहारे नहीं काटती सदियाँ,
फ़ैसले खुद अपने करने लगी हैं लङकियां.

हँसती हैं सिसकती हैं धधकती हैं लङकियां,
कमर कस के हर घङी को जीती हैं लङकियां.

हद करती हैं लङकियां  !



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