Wednesday, 4 August 2010










   रेस के घोड़े

   अरे छोड़िये !
   बस भी कीजिये !
   किसी के पास नहीं है .. 
   वक़्त
   इन फ़िज़ूल बातों का ! 
   ये सब रेस के घोड़े हैं !
   बेतहाशा भाग रहे हैं !
   किसे पड़ी है कि पूछे
   पड़ोस की बूढ़ी अम्मा से,
   अम्मा घुटनों का दर्द कैसा है !
   दवा तो डाक्टर देगा !
   या नहीं ?

   दुनिया में झमेले भतेरे हैं !
   और हम इकलौती जान लगे पड़े हैं !
   दूसरों के पापड़ बेलने लगे !
   तो हमारे घर में फ़ाके होंगे !

   ये सब बातें बहुत सुन लीं हमने ...
   बच्चों से खेलो.. बहुत खुश होंगे !
   बुजुर्गों से बतियाओ.. आशीर्वाद देंगे !
   खुशी और आशीर्वाद सब खेरीज हैं.. मानिए !
   करारे नोटों की ही कीमत है..जानिये !
   बीवी से पूछने बैठे कि आँख क्यूँ नम है..
   तो पहली रेस छूट जायेगी !
   दोस्तों की खोज-ख़बर लेने लगे ..
   तो तक़दीर की सीटी बज जायेगी !

   अरे छोड़िये ! ये बेकार की बातें !
   आपको एक फ़ार्मूला समझा दें !
   मिलजुल कर रहने पर मेडल नहीं मिलेंगे !
   जो सब कुछ भूल कर.. बस ! दौड़ते रहेंगे !
   वो ही घोड़े सबसे जल्दी रेस जीतेंगे !

   आप की मर्जी ! काटते रहिये फसल ..
   भलमनसी की ! अपनेपन की !
   आपसे और कुछ नहीं बनेगा !
   चाचाजी ज़रा बीमार हैं, ले आइये..
   उनके लिए बाज़ार से फल-सब्ज़ी !
   बहन ने कसम दी है, राखी बंधवाने आना है ..
   आंसू बहाते सरपट दौड़ जाइए.. ससुराल उसके !
   दोस्त ने परेशानियों से पस्त होकर याद किया है..
   हो आइये .. घंटों उसकी व्यथा सुनिए.. दिल पर हाथ रख के !

   कुछ होना-हवाना नहीं है इन कलाबाजियों से !
   कुत्ते की दुम टेढ़ी ही रही है सदियों से !
   आप क्या तीर मार लीजिएगा कसम से !
   आपसे लाख गुना हम अच्छे !
   दांये बांये बिल्कुल नहीं देखते !

   रेसकोर्स की घास के परे जो कुछ नहीं सोचेगा !
   लिख लीजिये वही घोड़ा एक दिन रेस जीतेगा !  




3 comments:

  1. आपकी इस बेहतरीन रचना को कल के "चर्चा मंच" में सम्मिलित किया गया है.....
    आभार्!

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  2. वाह्…………………एक तल्ख सच्चाई कह दी है।

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  3. बहोत खुब कहा आपने

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नमस्ते