नमस्ते namaste
शब्दों में बुने भाव भले लगते हैं । स्याही में घुले संकल्प बल देते हैं ।
सोमवार, 31 मार्च 2025
शनिवार, 29 मार्च 2025
नव संवत्सर अभिनंदन
नव संवत्सर के आगमन पर
नव संकल्प से होकर विभूषित
समवेत स्वर में करें अभिवादन
समर्पित भाव से हो शुभारंभ
हर दिन होता है एक नया दिन
नये सिरे से होती है यात्रा आरंभ
क्षितिज पर उदय होता नया सूर्य
दिग-दिगंत किरणों की वंदनवार
पंखुरियों की ओट ले खिले फूल
पंछी चहके, कल-कल बहा जल
पकी फसल, पवन छेङे मृदु मृदंग
भ्रमर चकित सुन सृष्टि का अनुनाद
बोएं नई फसल, नया पौधा रोप,
नव अनुसंधान, नवाचार सत्कार
रचें कला के नये प्रसंग, प्रतिमान
प्रति क्षण नई संभावना का आगार
गुरुवार, 27 मार्च 2025
जगत का रंगमंच
खचाखच भरा हाॅल है ।
बिगुल बज चुका है ।
अब शुरु होता है,
दुनिया का खेला ।
सामने है बङा-सा पर्दा
जो अभी उठेगा ।
जैसे ही पर्दा उठेगा
प्रत्येक पात्र सजग
किरदार में आ जाएगा ।
पहचानना मुश्किल होगा !
मुखौटों को हम जानते हैं,
किरदार को नहीं ना !
इतने पास से कब देखा है
किसी को नकाब हटा कर ?
नाटक में रहस्य है,रोमांच है !
इसी प्लाॅट में तो मज़ा है !
वर्ना सच कौन जानता है ?
या जानना चाहता है ?
इसलिए वेश-भूषा बदल-बदल
सच सबको छकाता है !
अंत तक पहुँचते-पहुँचते सच
ग़ायब हो जाएगा …
किरदार सबके मन भाएगा।
सच की परवाह किसे है ?
मुखौटा ही हाथ आएगा ।
तालियों की गङगङाहट !
पटाक्षेप होते-होते सच
दर्शक दीर्घा से चुपचाप
बाहर निकल जाएगा ।
सच साधारण जन है ।
कहीं भी मिल जाएगा ।
रंगमंच जीवन बूझने की
बहुरुपी कला है ।
बहरुपिया हमेशा
पहेलियाँ ही बुझाएगा ।
मुंबई स्ट्रीट आर्ट से ली छवि उधार.. साभार ।