सोमवार, 6 जुलाई 2020

अपने में क्या रहना ?



कभी देखा है 

किसी वृक्ष को 
अपने में 
सिमट कर रहते ?

वृक्ष की जड़ें
मिट्टी में जगह
बनाती जाती हैं ।
वृक्ष की शाखाएं
बाहें पसारे
झूला झूलती हैं,
पल्लवित होती हैं ।

फूल खिलते हैं
जब पंखुरियाँ
घूँघट खोल
श्याम भ्रमर को
भोलेपन से तकती हैं ..
हौले से खिलती हैं ।
खिलती हैं नृत्य मुद्रा में,
सुगंध घोलती हुई
धीर समीर में,
लयबद्ध लहर लहर ।

फिर फल आते हैं,
पक कर गिर जाते हैं,
धरती की झोली में ।
पत्तियों की ओट में
पंछी टहनी टहनी
जोड़ घोंसला बनाते हैं ।

ये सब इसलिए
कि खुली बाँहों में ही
आकाश समा पाता है ।
क्योंकि निरंतर बहना
नदी को निर्मल बनाता है ।

इसलिए नदी की तरह बहना ।
खुशबू की तरह हवाओं में
घुलमिल कर जीना ।
सिर्फ़ अपने में क्या रहना ?



शुक्रवार, 26 जून 2020

रिश्तों का मर्म

रिश्ते 
रेत के महल होते हैं ।
भव्य सुंदर मनोरम
पर एक लहर आए
तो ढह जाते हैं ।
उंगलियों के बीच से
रेत की तरह 
फिसल जाते हैं,
देखते-देखते ।
जतन ना करने से
और कई बार
बिना किसी वजह
रीत जाते हैं ।

संबंध
छीज जाते हैं ।
जैसे छलनी में से
जल ।
अश्रु जल से
बह जाते हैं,
जब बांध
टूट जाता है ।

भवितव्य
पता किसे ?
पर रिश्ते
बनते ही हैं
भले टूट जाएं
कालांतर में ।
बदल जाएं
अनायास ।

स्वभावगत 
क्रम टूटता नहीं पर
प्रकृति का ।
कण-कण जुड़ा है,
एक दूसरे से ।
रिश्ते ना जुड़ें
ये हो सकता नहीं ।
रिश्तों के बिना
आदमी जी सकता नहीं ।

तो क्या हुआ ?
रिश्ते बनाना-निभाना
कष्टप्रद हो या सुखद
व्यर्थ नहीं जाता 
रिश्ते जीना ।

हर रिश्ता
कोई बीज बो जाता है ।
फले ना फले बीज
वृक्ष बन ही जाता है ।
वृक्ष की सघन छाँव में
संभव है एक दिन
कोई थक कर बैठे
और समझ पाए
लेन-देन से परे
रिश्ते-नातों का मर्म ।




गुरुवार, 11 जून 2020

अंतर्कथा

तिरेपन तुरपनों के बाद
बार-बार उधड़ी सिलाइयों की,
तिरेपन पैबंद जोड़ने के बाद,
रंग कुछ फीके पड़ने के बाद,
जैसा भी है कथा ताना-बाना,
कुल मिला कर बुरा नहीं रहा,
हिसाब-किताब लेन-देन का,
बही खाते में जो दर्ज हुआ ।
जुलाहे ने जतन से जो बुना था ।
साधारण पर कच्चा नहीं था धागा ।
धागों और बुनावट की सुघड़ कला
सीखते-समझते समय सरस बीता
तिरेपन धागों की तिहत्तर तुकबंदियां
तमाम किस्सा बिल्कुल वैसा ही था
जैसा और जितना हमसे बन पड़ा ।
अब आगे बढ़ती है धागों की अंतर्कथा ।