हम गर्व तो नहीं करते रह सकते।
उसने कहा।
छर्रे की तरह
उसका ये कहना
चीर गया।
उसने कहा
क्योंकि उसका कोई अपना
शहीद हुआ था।
वो ख़बर पढ़ कर
नहीं बोला।
ज़माने ने पढ़ा
आगे बढ़ गया ।
शहीद का कुनबा
ठगा-सा रह गया।
इसलिए बोला।
अब क्या होगा ?
दो जून रोटी का
जुगाड़ कैसे होगा ?
पहाड़ से जीवन का
हिसाब कैसे होगा ?
सब जुटाना होगा।
गर्व से क्या होगा ?
कल फिर कोई शहीद होगा।
सारे देश को गर्व होगा।
फिर क्या होगा ?
कभी सोचा ?
बस गर्व करने से क्या होगा ?
कभी नहीं सोचा।
क्योंकि हमारा अपना
शहीद नहीं हुआ।
जो शहीद हुआ।
आंकड़ा था।
अपना नहीं था।
इसलिए फिर गर्व हुआ।
पर उसने कहा -
हम हमेशा,
गर्व तो नहीं करते रह सकते।

