नख पर गिरि गोवर्धन उठा लिया ।
नख से ही हिरण्यकशिपु को तारा ।
ना नर, ना मानव, नृसिंह रुप धरा ।
विराट चट्टान सा खंबे से प्रगट हुआ।
रौद्र स्वरुप ने जग का ह्रदय कंपाया,
प्रह्लाद ने पर करुणामय दर्शन पाया ।
ना दिन था ना रात जब काल आया
न्याय का ऐसा समय हरि ने ठहराया
दिवस रात्रि मध्य संधिकाल आया ।
इस घङी प्रभु आ विराजे देहरी पर ,
दानवराज अर्जित वर का रख मान ,
श्री नर हरि ने किया उसका उद्धार ।
क्षितिज पर मिलते हैं समय के दो छोर
असंभव को संभव कर हे लीलाधर !
निज भक्त प्रह्लाद को दिया करावलंबन ।
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷
चित्र साभार : अंतरजाल
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 2 मई 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
जय नरसिंह भगवान की!
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंWelcome to blog new post
भक्तिभाव मय सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर।
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुन्दर और सार्थक रचना
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंवाह
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंअच्छी रचना
जवाब देंहटाएं