ठुमक-ठुमक परकोटे पर
फुदक फुदक छज्जे पर
बेनागा रोज़ाना आती ।
चहचहा हर सुबह जगाती ।
छप-छप-छप जल से खेलती,
दाना चुग चुग खुशी मनाती ।
चोंच में तिनके सुतली,टहनी
काग़ज़, पत्ते बटोर ले जाती,
घोंसला बना कर घर बसाती ।
सीधी-सादी सी मनभाती गौरैया
मिलनसार किरायेदार बन जाती ।
कीट-कीटाणु सफ़ाचट करती,
आबोहवा स्वच्छ कर देती ।
यानी पेशगी किराया दे देती !
दिनचर्या से ऐसी जुङ जाती,
सुबह-साँझ उसके कहे आती ।
शुभ वेला का स्मरण कराती ।
आस की पाती मनमौजी गौरैया
घर में घर कितना सा बनाती ?
चहल-पहल से अपनी चिमणी
दिल में गहरे घर कर जाती ।
एक तथ्य है सर्व विदित सर्वत्र
आदमी की धङकन सम पर
स्वत: ले आती जब-जब कोई
गौरैया सी चिरैया चहचहाती ।
कुछ और पन्ने
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आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 21 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंवाह!! कितने सुंदर शब्दों में आपने एक गौरैया की कहानी सुनायी है, वाक़ई उसे फुदकते और गाते देखना हर किसी के लिये सुंदर अनुभव होता है
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