नवागन्तुक समय प्रतीक्षारत देहली पार
देहली के भीतर रच-बस गया है अतीत
बीते कल की नब्ज़ थाम करना स्वागत
चुनौतियाँ मिलेंगी करते ही चौखट पार
खुलते ही द्वार होता संभावना का जन्म
हवा-पानी,गंध,धूप और धूल का पदार्पण
ठोक-पीट सिखाता जीवन का शिष्टाचार
अनुभव और अनुभूति के सहज नेगाचार
मन की वीथियों के छूटें जब द्वंद और फंद
तब खुलते हैं स्वत: सानंद मंदिर के कपाट
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कोलम कलाकार : श्री करन पति

यह कविता मुझे किसी दोस्त की समझाइश जैसी लगी, जो जीवन की दहलीज़ पर खड़ा होकर धीरे से सच बता देता है। आप अतीत और वर्तमान को बहुत सहज तरीके से आमने-सामने रखते हैं। दहलीज़, चौखट, द्वार जैसे बिंब मुझे रोज़मर्रा के अनुभव से जोड़ देते हैं। जीवन की ठोक-पीट वाली सीख यहाँ बिल्कुल असली लगती है, किताबी नहीं।
जवाब देंहटाएंमन की वीथियों के छूटें जब द्वंद और फंद
जवाब देंहटाएंतब खुलते हैं स्वत: सानंद मंदिर के कपाट
जीवन का सार बताती बहुत ही सुंदर रचना
वाह!!!
"कपाट" कितना सुंदर,गहन भाव लिए विश्लेषण किया आपने। बहुत सुंदर रचना।
जवाब देंहटाएंसस्नेह सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर
जवाब देंहटाएंखुलते ही द्वार होता संभावना का जन्म
जवाब देंहटाएंवाह - सुंदर रचना
मंदिर के कपाट के माध्यम से कर्मकांडी पूजा से इतर आध्यात्मिक पूजन की उचित शब्द चित्रण ...
जवाब देंहटाएंमन ही देवता, मन ही मन्दिर, मन ही पूजा, मन ही अक्षत, मन ही रोली, मन ही दीपक, मन ही आरती।
मन ही मंत्रोच्चार, मन ही ध्यान, मन ही उपवास, मन
ही हवन, मन ही है प्रसाद, मन ही दुःख, मन ही खुशी।
.. शायद ...
सुंदर रचना
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