कुछ और पन्ने

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

मंदिर के कपाट

 

 

नवागन्तुक समय प्रतीक्षारत देहली पार  

देहली के भीतर रच-बस गया है अतीत


बीते कल की नब्ज़ थाम करना स्वागत

चुनौतियाँ मिलेंगी करते ही चौखट पार


खुलते ही द्वार होता संभावना का जन्म 

हवा-पानी,गंध,धूप और धूल का पदार्पण 


ठोक-पीट सिखाता जीवन का शिष्टाचार 

अनुभव और अनुभूति के सहज नेगाचार


मन की वीथियों के छूटें जब द्वंद और फंद 

तब खुलते हैं स्वत: सानंद मंदिर के कपाट

 

____________________________________________

                    कोलम कलाकार : श्री करन पति

7 टिप्‍पणियां:

  1. यह कविता मुझे किसी दोस्त की समझाइश जैसी लगी, जो जीवन की दहलीज़ पर खड़ा होकर धीरे से सच बता देता है। आप अतीत और वर्तमान को बहुत सहज तरीके से आमने-सामने रखते हैं। दहलीज़, चौखट, द्वार जैसे बिंब मुझे रोज़मर्रा के अनुभव से जोड़ देते हैं। जीवन की ठोक-पीट वाली सीख यहाँ बिल्कुल असली लगती है, किताबी नहीं।

    जवाब देंहटाएं
  2. मन की वीथियों के छूटें जब द्वंद और फंद

    तब खुलते हैं स्वत: सानंद मंदिर के कपाट
    जीवन का सार बताती बहुत ही सुंदर रचना
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं
  3. "कपाट" कितना सुंदर,गहन भाव लिए विश्लेषण किया आपने। बहुत सुंदर रचना।
    सस्नेह सादर।
    -----
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  4. खुलते ही द्वार होता संभावना का जन्म
    वाह - सुंदर रचना

    जवाब देंहटाएं
  5. मंदिर के कपाट के माध्यम से कर्मकांडी पूजा से इतर आध्यात्मिक पूजन की उचित शब्द चित्रण ...

    मन ही देवता, मन ही मन्दिर, मन ही पूजा, मन ही अक्षत, मन ही रोली, मन ही दीपक, मन ही आरती।

    मन ही मंत्रोच्चार, मन ही ध्यान, मन ही उपवास, मन
    ही हवन, मन ही है प्रसाद, मन ही दुःख, मन ही खुशी।
    .. शायद ...

    जवाब देंहटाएं

कुछ अपने मन की भी कहिए