अपने कर्म हीभाग्य सँवारते हैं ।अपने कर्म हीआङे आते हैं ।अपने कर्म हीदाँव लगाते हैं ।अपने कर्म हीखूब पछाङते हैं ।अपने कर्म हीपहचान बनाते हैं ।अपने कर्म हीधूल चटाते हैं ।बाकी सारी बातेंसब बेकार हैं ।अपने कर्म हीबनाते-बिगाङते हैं ।बात-बात परभगवान को क्यों कोसें ?बाधाएँ आने परदूजों को क्यों दोष दें ?आदमी क्यों जीवन भरजोङ-तोङ बैठाता है ?जब अपना किया हीअपने खाते में जाता है ।
ठीक कहा नूपुर जी आपने
जवाब देंहटाएंबात-बात पर भगवान को क्यों कोसें ? बिल्कुल सही।
जवाब देंहटाएंसही है, जैसी करनी वैसी भरनी
जवाब देंहटाएंहमारे भविष्य और चरित्र का निर्धारण हमारे कर्म के द्वारा होते है।
जवाब देंहटाएंसुंदर एवं सटीक अभिव्यक्ति।
सादर।
-------
जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार १० अप्रैल २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
उम्दा
जवाब देंहटाएंबात तो सौ आने सही है पर कभी कभी शक भी होने लगता है वैसे तो जब ईरान अमेरिका युद्ध को देखते हैं जैसे :)
जवाब देंहटाएं