Saturday, 11 February 2017

कोई सुन रहा है





कई बार 
ऐसा होता है  . . 
जब धूप ढ़ल रही होती है,   
अंतर्मन में कहीं 
सूर्य अस्त होने लगता है ।

बहुत कुछ कहना होता है,
पर शब्द पर्याप्त नहीं होते ।
बहुत कुछ कहना होता है ,
पर कोई सुनने वाला नहीं होता ।

उस वक़्त, 
अगर ध्यान से देखो 
और महसूस करो, 
सर पर तुम्हारे नीला आसमान 
अपना प्यार भरा 
हाथ रख देता है । 

पेड़ हाथ हिला-हिला कर 
अपनी छाँव में बैठने को बुलाते हैं ।
गौरैया का लगा रहता है 
आना-जाना  . . 
क्यों तुम पाते हो अपने को अकेला ?

नन्हे पौधों पर 
हौले-हौले हिलती 
हरी कोमल पत्तियां, 
गुनगुनी धूप में खिले 
किसिम - किसिम के फूल 
मुस्कुराते हैं 
और देते हैं 
मौन आश्वासन  . . 
कोई जान रहा है 
तुम्हारे मन की बात  . . 
कोई सुन रहा है ।   


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नमस्ते