Friday, 19 June 2015

प्रसाद दो ना


घर का रास्ता खो गया । 
मुझे याद नहीं 
अपना ही पता । 
काश कोई अपना 
राह चलते मिल जाता,
घर तक पहुँचा आता ।

हे ईश्वर ! परमपिता !
तुम ही ने जब 
इस भूल भुलैया का 
खेल है रचा ,
तो तुम ही क्यों नहीं 
अब बता देते सही पता ?
तुम्हें तो सब कुछ है पता ,
तुम्हारा ही तो है एकमेव आसरा ।

बताओ तो भला 
ऐसा क्यों हुआ ?

जिन्हें तुमने मार्ग बुझाने भेजा 
वो भी क्यों बुझाते हैं पहेली ?
क्यों नहीं करते बात सीधी - सच्ची ?
सहजता की क्यों कोई अब मान्यता नहीं रही ??
क्यों नहीं बोलता कोई 
सहज और सरल प्रेम की बोली ?

क्या मान्यताओं और विषम परिस्थितियों में ही 
उलझा कर, 
लेते रहोगे तुम निरंतर परीक्षा ?
क्या सरल आस्था और समर्पण की 
मिटटी में, 
ना खिल सकेगा 
भक्ति का पौधा ?

यदि हाँ तो अभी ही उत्तर दो ना !
मन की अपार व्यथा दूर करो ना !
मेरी ऊँगली पकड़ कर मुझे घर तक पहुँचा दो ना !



2 comments:

Anjali Sengar said...

Beautiful poem :)

http://zigzacmania.blogspot.in/

Shams Noor Farooqi said...

मिल चुका घर इस तरह तो। सड़क पर अकेली खड़ी छोटी से बच्ची, घुँघराले से बाल, आँखों से बहते आँसू, कभी रोती, तो कभी हैरान परेशान हर आने जाने वाले को अपनी बड़ी बड़ी आँखों से देखती, कहती मुझसे वह – घर खो गया है मेरा। तो कहता उससे मैं कि घर वहीं है, घर का रास्ता भी वहीं है, आप खो गए हैं बेटा। फिर मैं उसको बताता कि तीन मोड़ के बाद दायें, फिर चार गली छोड़ कर चौराहे से बायें, फिर मंदिर से एक मोड़ पहले फिर दायें। अरे रास्ता सीधा होता तो आप खो कैसे जाते।

अगर उसे देना होता आसानी से, तो ऐसी दुविधा जीवन में भरता ही क्यों? नहीं, यह परीक्षा नहीं है। परीक्षा तो तब होती, जब इस कठिन मार्ग पर चलना सिखाया गया होता। फिर देखते कि चल सके या नहीं। मगर यहाँ तो कुछ पता ही नहीं, किस मोड़ पर क्या मिलेगा। कोई पहेली भी नहीं। उसने कुछ बुझाया ही नहीं। जब उसने नहीं बुझाया, तो कोई दूसरा क्या बुझायेगा।

तो हुआ क्या? यह है क्या चक्कर सारा। उसने किया है क्या?

उसने अंधकार रचा। घना अंधकार। और राह में पत्थर बिछा दिये। और कहा – अब चल। नहीं, यह परीक्षा नहीं। बच्चे की परीक्षा नहीं ली जाती। यह केवल कौतूहल है। वह परमपिता, जो सब कुछ जानता है, फिर भी उसके हृदय में लहरें मारते अथाह प्रेम के सागर में कोलाहल है – ‘मेरे बच्चे, तू जो मुझसे उत्पन्न हुआ, देखें तो ज़रा, तूने मुझसे लिया क्या है? तू जानता भी है, तू किसका बेटा है?’

और वह नहीं बताता कि उसने अपने बच्चे के हृदय में अनंत प्रकाश छुपा दिया है। वह चाहता है कि मेरा बेटा इस बात को साबित करे कि वह ईश्वर पुत्र है। वह खुद उस प्रकाश को ढूँढे, जिससे वह उत्पन्न हुआ है, और वह उसी के हृदय में छुपा हुआ है।

ऐसा भी नहीं, कि उसने किसी को मदद के लिये भेजा नहीं। वह ईश्वर से ज्ञान ले कर आया। इसी लिये तो बुद्ध कहलाया। उस महाज्ञानी ने जीवन में जो कुछ भी कहा, उसे तीन शब्दों में सार किया जा सकता है – “अपने अन्दर ढूंढो।” - क्योंकि यही कुल ज्ञान है, जिसकी मनुष्य को आवश्यकता है।

रही बात कविता की – अच्छी है। भावना का प्रवाह सरल है। बातों में निरन्तरता है। यह पढ़ने वाली कम, सुनने वाली ज़्यादा है। क्योंकि आवाज़ का उतार चढ़ाव शब्दों की भावना को और प्रबल कर देगा। बस एक बात ज़रा सी अखरी। यह नहीं कह रहा कि इससे कविता ख़राब हो गयी, या कोई कमी आ गई। कविता अपनी जगह उतनी सी सशक्त है। बड़े मासूम तरीक़े से शुरू हुई, कि जैसे एक बच्चे का रास्ता खो गया है। घर नहीं मिल रहा। क्रमशः बात विषम और गम्भीर होती चली गई। यह तो ठीक था। फिर अचानक अति गम्भीर विषय – परीक्षा और भक्ति – से फिर मासूमियत पर आ गई – कोई मुझे घर पहुंचा दो न।
जिस तरह कविता से शुरू में बड़े होने में थोड़ा समय लिया उसी तरह अगर आख़िर में दोबारा अपनी मासूमियत में लौटने में कुछ और पंक्तियाँ लेती तो वही निरन्तरता बनी रहती जो शुरू से थी, और कविता एक चक्र पूरा कर लेती।

अंत अच्छा बन पड़ा है वैसे अपने आप में। मैं अंतिम तीन पंक्तियों की बात कर रहा हूँ। ऊंगली पकड़ कर घर पहुंचाना बहुत अच्छा है। मैं पहली पंक्ति में से ‘अभी ही’ निकाल दूँगा - यदि हाँ / तो उत्तर दो ना! // मन की अपार व्यथा / दूर करो ना! // मेरी ऊँगली पकड़ कर मुझे / घर तक पहुँचा दो ना!

दुआ है – वह परमपिता, स्वयं उतरे तेरी ऊंगली को पकड़ने। और तुझे गोद में उठा कर कहे – "क्यों रो रही है मेरी बच्ची। मैं तो सदा तेरे साथ था। चल घर चलते हैं।"
आमीन॥

नमस्ते

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