Sunday, 15 February 2015

तुम हो



जब छत से आँगन में धूप उतरती है,
मुझे लगता है कि तुम हो ।
तुम हो ।
सुनहरी धूप की गुनगुनी छुअन तुम हो ।
मेरी हर बात में तुम हो ।
हर इक अहसास में तुम हो ।

जब घर की क्यारी में फूल खिलते हैं,
मुझे लगता है कि तुम हो ।
तुम हो ।
इन फूलों की भीनी खुशबू तुम हो ।         
मेरी हर बात में तुम हो ।
हर इक अहसास में तुम हो ।

जब खेतों में पुरवाई चलती है,
मुझे लगता है कि तुम हो ।
तुम हो ।
चंचल हवाओं की अल्हड़ शोखी तुम हो ।
मेरी हर बात में तुम हो ।
हर इक अहसास में तुम हो ।

जब बरामदे में बच्चे शोर मचाते हैं,
मुझे लगता है कि तुम हो ।
तुम हो ।
शरारती बच्चों की मासूमियत तुम हो ।
मेरी हर बात में तुम हो ।
हर इक अहसास में तुम हो ।



2 comments:

Om Parkash sharma said...

जिसको उस पर अटूट विशवास होता है उसे पत्येक कार्य में उसका ही अहसास होता है, इसी भाव को व्यक्त करती सुन्दर कविता |

noopuram said...

ॐ प्रकाश शर्माजी,

आपका आभार .

मार्गदर्शन करते रहियेगा .

नमस्ते .

नूपुर

नमस्ते

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