Saturday, 5 July 2014

फूल बनाम मुन्ना



अपने हाथों से लगाये पौधे पर ,
खिलती हैं कलियाँ जब , 
जी खुश हो जाता है तब !
अपने नन्हे-मुन्ने की 
मासूम दूधिया हँसी 
देख कर भी ,
लगता है यही ।

यही कि देखते-देखते हर कली 
फूल बन कर थामेगी टहनी ।
इसी तरह आँखों के सामने मेरी
नौनिहाल मेरा 
होगा बड़ा ,
थाम कर हाथ मेरा ,
नन्हे-नन्हे कदम रखता 
चलेगा पैयाँ पैयाँ ।

नन्हा मुन्ना मेरा 
एक फूल प्यारा प्यारा ।
हौले-हौले खिला
फूल ही है मुन्ना हमारा ।



2 comments:

Shams Noor Farooqi said...

हाँ, फूल ही तो है। नाज़ुक सा विचार यह। कली को खिलते देखना और अपने नन्हे मुन्ने को बढ़ते। चलो, काफी दिनों बाद कुछ अच्छा पढ़ने को मिला। हौले हौले, पैयां पैयां एक नन्हा मुन्ना सा ख़्याल देखते देखते बड़ा हो गया। कहाँ रहती हैं नूपुर। कविता आप के हर तरफ़ बिखरी पड़ी है। बस नज़र चाहिये एक, उसे देखने के लिये।

दूधिया हंसी अच्छा लगा। आप की कविताओं को फूल की तरह खिलता देखता हूँ। दुआ है, उनकी ख़ुशबू और रंगत दूर तक फैले। ख़ुश रहें। लिखती रहें।

noopuram said...

हौले हौले, पैयां पैयां एक नन्हा मुन्ना सा ख़्याल देखते देखते बड़ा हो गया।

यह बात आपकी नज़र में ही आ सकती थी शम्स साहब !

आपके आशीर्वाद से शब्दों की बुनावट का रंग गहरा चढ़े और खुशबू आये ऐसी अभिव्यक्ति हमारी हो ये ईश्वर से प्रार्थना है ।

आप ख़ामोश मत हो जाइयेगा फिर से । बस इतना काफ़ी है ।

नमस्ते

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